केंद्र सरकार ने अरावली पहाड़ियों को लेकर बड़ा और स्पष्ट फैसला लिया है। मोदी सरकार ने सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि अरावली क्षेत्र में किसी भी तरह का नया खनन पट्टा न दिया जाए। यह आदेश बुधवार को जारी किया गया। सरकार का कहना है कि पर्यावरण से समझौता अब नहीं होगा। लगातार हो रहे खनन से अरावली को भारी नुकसान पहुंचा है। विशेषज्ञों की चेतावनी को गंभीरता से लिया गया है। यह कदम प्राकृतिक विरासत को बचाने की दिशा में बताया जा रहा है।
अरावली इतनी अहम क्यों है?
अरावली पर्वतमाला दुनिया की सबसे पुरानी पहाड़ियों में गिनी जाती है। अरावली पर्वतमाला दिल्ली से गुजरात तक फैली हुई है। यह रेगिस्तान को फैलने से रोकने में बड़ी भूमिका निभाती है। जंगलों और वन्यजीवों का सहारा यही पहाड़ हैं। भूजल रिचार्ज में भी अरावली मदद करती है। लगातार खनन से इसकी संरचना कमजोर हुई है। सरकार मानती है कि इसे एक सतत भूगर्भीय संरचना के रूप में बचाना जरूरी है।
खनन पर किस तरह की रोक लगी?
केंद्र के पर्यावरण मंत्रालय ने साफ शब्दों में प्रतिबंध लगाया है। पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने कहा है कि गुजरात से लेकर एनसीआर तक कहीं भी नया खनन पट्टा नहीं दिया जाएगा। यह रोक पूरे अरावली क्षेत्र पर लागू होगी। किसी राज्य के लिए अलग नियम नहीं होंगे। अनियमित और अवैध खनन पर भी सख्ती होगी। सरकार का उद्देश्य पहाड़ियों की प्राकृतिक निरंतरता बनाए रखना है। फिलहाल किसी तरह की छूट का संकेत नहीं दिया गया है।
नए प्रतिबंधित क्षेत्र कौन तय करेगा?
केंद्र ने एक अहम जिम्मेदारी वैज्ञानिक संस्था को दी है। भारतीय वानिकी अनुसंधान एवं शिक्षा परिषद अरावली में ऐसे नए क्षेत्रों की पहचान करेगी जहां खनन पूरी तरह रोका जाना चाहिए। यह अध्ययन पूरे अरावली बेल्ट पर होगा। इसमें पारिस्थितिक संवेदनशीलता को आधार बनाया जाएगा। भूगर्भीय महत्व भी देखा जाएगा। रिपोर्ट के आधार पर आगे के फैसले होंगे। इससे संरक्षण की नीति को वैज्ञानिक मजबूती मिलेगी।
चल रहे खनन का क्या होगा?
सरकार ने मौजूदा खनन को खुली छूट नहीं दी है। राज्यों को निर्देश दिए गए हैं कि पर्यावरण नियमों का सख्ती से पालन कराया जाए। सभी खनन गतिविधियां सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देशों के तहत ही चलेंगी। जरूरत पड़ी तो और प्रतिबंध लगाए जाएंगे। सरकार ने साफ कहा कि टिकाऊ खनन से समझौता नहीं होगा। किसी भी उल्लंघन पर कार्रवाई होगी। प्राथमिकता पर्यावरण सुरक्षा को दी गई है।
राज्यों और उद्योग पर असर क्या?
अरावली क्षेत्र में खनन करने वाले राज्यों को बदलाव का सामना करना पड़ सकता है। केंद्र का मानना है कि पर्यावरण लाभ आर्थिक नुकसान से कहीं ज्यादा हैं। उद्योग को अब टिकाऊ विकल्पों की ओर जाना होगा। यह फैसला साफ संकेत देता है कि व्यापार से ऊपर प्रकृति है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे ग्रीन इनोवेशन को बढ़ावा मिलेगा। राज्यों की निगरानी सख्त होगी। भविष्य के कानूनी विवाद भी कम हो सकते हैं।
राजनीतिक रूप से फैसला क्यों अहम?
यह फैसला पर्यावरण को राष्ट्रीय प्राथमिकता के रूप में स्थापित करता है। सरकार ने लंबे समय से लंबित मुद्दे पर निर्णायक रुख अपनाया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी यह भारत की प्रतिबद्धता दिखाता है। अरावली को अब सिर्फ जमीन नहीं माना गया है। इसे एक जीवित पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में देखा गया है। आने वाली पीढ़ियों के लिए संरक्षण जरूरी माना गया है। यह नीति बदलाव का स्पष्ट संकेत है।

























