बड़े शहरों की जिंदगी बाहर से चमकदार दिखती है लेकिन अंदर से काफी खाली हो चुकी है। लंबी नौकरी। रोज का सफर। सीमित दोस्त। परिवार से दूरी। इन सबने इंसान को भीतर से अकेला कर दिया है। Delhi और Gurugram जैसे शहरों में लोग दिनभर लोगों के बीच रहते हैं फिर भी बात करने वाला कोई नहीं होता। यही वजह है कि अकेलापन अब एक आम शहरी समस्या बन चुका है।
लोग संग-साथ किराए पर क्यों ले रहे हैं?
अब कई लोग सिर्फ इसलिए पैसे दे रहे हैं ताकि कोई उन्हें सुने। कोई उनके साथ बैठकर चाय पी सके। यह न डेटिंग है। न रोमांस। न कोई रिश्ता। बस बातचीत है। मन की भड़ास निकालना है। अपने दिन की कहानी सुनानी है। शहरी युवाओं को ऐसा सुरक्षित माहौल चाहिए जहां वे बिना जजमेंट बात कर सकें। यही जरूरत इस नए चलन को जन्म दे रही है।
किन शहरों में यह चलन तेजी से बढ़ा?
यह ट्रेंड सिर्फ एक शहर तक सीमित नहीं है। Mumbai, Bengaluru, Kolkata, दिल्ली और गुरुग्राम जैसे शहरों में ऐसे कई ग्रुप और स्टार्टअप उभर रहे हैं। ये ऑफलाइन मिलने के सत्र रखते हैं। सीमित लोग। तय समय। टिकट लेकर एंट्री। लोग इसलिए आ रहे हैं क्योंकि अकेलापन अब सहन करना मुश्किल हो गया है।
डिजिटल दुनिया भावनाएं क्यों नहीं भर पाई?
सोशल मीडिया ने लोगों को जोड़ तो दिया है लेकिन दिलों को नहीं। लाइक। कमेंट। चैट। सब कुछ मौजूद है। लेकिन आमने-सामने बैठकर बात नहीं होती। आंखों में आंख डालकर सुनना खत्म हो गया है। यही वजह है कि भावनात्मक खालीपन बढ़ता जा रहा है। खासकर वे युवा जो पढ़ाई या नौकरी के लिए अपना शहर छोड़ चुके हैं सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
मानसिक सेहत पर इसका कितना असर है?
लंबे समय तक अकेलापन डिप्रेशन का रूप ले सकता है। नींद खराब होती है। तनाव बढ़ता है। चिड़चिड़ापन आ जाता है। मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ मानते हैं कि बातचीत इंसान के लिए दवा जैसी है। किसी को सुनना और किसी द्वारा सुना जाना दोनों जरूरी हैं। यही वजह है कि लोग अब फिर से ऑफलाइन जुड़ाव की ओर लौट रहे हैं।
क्या ऐसे सत्र सुरक्षित माने जा सकते हैं?
इन आयोजनों में सुरक्षा पर खास ध्यान दिया जाता है। लोगों की संख्या सीमित रहती है। टिकट सिस्टम होता है। कई जगह पहचान की जांच होती है। स्क्रीनिंग कॉल ली जाती है। डेटिंग को सख्ती से मना किया जाता है। माहौल सम्मानजनक रखा जाता है ताकि हर व्यक्ति खुलकर बोल सके और खुद को सुरक्षित महसूस करे।
समाज के लिए यह रुझान क्या संकेत देता है?
यह नया चलन साफ संकेत देता है कि इंसान आज भी इंसानी जुड़ाव चाहता है। अकेलापन अब सिर्फ व्यक्तिगत समस्या नहीं रहा। यह सामाजिक चेतावनी बन चुका है। जब रिश्ते कमजोर होते हैं तो ऐसे बाजार जन्म लेते हैं। यह समय है कि लोग एक-दूसरे के लिए समय निकालें। नहीं तो आने वाले समय में अकेलापन और गहराता जाएगा।

























