छत्तीसगढ़ की धरती पर एक अलग ही दृश्य देखने को मिला है। 63 नक्सली खुद चलकर सामने आए हैं। उन्होंने अपनी बंदूकें नीचे रख दी हैं। ये लोग सालों से जंगलों में डर के बीच जी रहे थे। सरकार की पुनर्वास नीति ने उनका मन बदला है। पुलिस ने उन्हें सुरक्षा का भरोसा दिया है। इसी वजह से वे सामने आए। लोग अब राहत महसूस कर रहे हैं। गांवों में शांति की उम्मीद जगी है। यह बदलाव बड़ा संकेत माना जा रहा है। यह दिखाता है कि हिंसा का रास्ता छोड़ने की सोच बन रही है।
क्या इनामी नक्सली भी मुख्यधारा में लौटे हैं?
इन 63 में से 36 ऐसे नक्सली हैं जिन पर इनाम घोषित था। कुछ पर आठ लाख रुपये तक का इनाम था। कुछ पर पांच लाख रुपये रखे गए थे। ये वही लोग थे जिनसे इलाके में डर था। अब वही लोग कानून के सामने खड़े हैं। पुलिस अधिकारियों ने इसे बड़ी कामयाबी बताया है। उनका कहना है कि इससे जंगलों में शांति बढ़ेगी। इनकी वापसी से संगठन कमजोर होगा। आम लोगों को अब राहत मिलेगी। यह सरकार की नीति की जीत मानी जा रही है।
किस इलाके में ये नक्सली सबसे ज्यादा सक्रिय थे?
पुलिस के मुताबिक ये नक्सली दक्षिण बस्तर में सक्रिय थे। पश्चिम बस्तर के जंगलों में भी इनकी मौजूदगी थी। अबूझमाड़ क्षेत्र भी इनका गढ़ रहा है। कुछ ओडिशा सीमा के पास काम कर रहे थे। ये इलाके लंबे समय से हिंसा से जूझ रहे थे। वहां डर का माहौल बना रहता था। अब जब बड़े नाम लौट रहे हैं तो लोगों का भरोसा बढ़ रहा है। सुरक्षा बलों की मेहनत दिखने लगी है। गांवों में फिर से हलचल शुरू हो रही है। हालात धीरे धीरे सुधरते नजर आ रहे हैं।
इन सभी पर कुल कितना इनाम घोषित था?
इन 36 इनामी नक्सलियों पर कुल एक करोड़ से ज्यादा का इनाम था। कुछ पर दो दो लाख रुपये रखे गए थे। कुछ पर एक एक लाख रुपये थे। कई पर पचास हजार का इनाम भी था। ये रकम काफी बड़ी मानी जाती है। इसके बावजूद इन लोगों ने पैसा नहीं चुना। उन्होंने शांति को चुना। यह समाज के लिए अच्छा संकेत है। सरकार भी इसे सकारात्मक बदलाव बता रही है। इससे नई सोच को बढ़ावा मिलेगा। हिंसा छोड़ने का रास्ता अब आसान दिख रहा है।
सरकार इन लोगों की मदद कैसे करेगी?
सरकार ने साफ किया है कि हर आत्मसमर्पण करने वाले को तुरंत पचास हजार रुपये दिए जाएंगे। उन्हें रहने के लिए घर मिलेगा। काम के लिए प्रशिक्षण दिया जाएगा। समाज में दोबारा बसने में मदद की जाएगी। मकसद है कि वे फिर गलत रास्ते पर न जाएं। पुलिस और प्रशासन उनकी देखरेख भी करेंगे। उन्हें नई पहचान दी जाएगी। यह पूरी योजना उन्हें सम्मान से जीने का मौका देगी। सरकार चाहती है कि वे आम नागरिक बनें। इससे पूरे इलाके को फायदा होगा।
क्या इससे पहले भी नक्सली आत्मसमर्पण कर चुके हैं?
इससे पहले सात जनवरी को सुकमा में 26 नक्सली लौट चुके हैं। साल 2025 में अब तक 1500 से ज्यादा नक्सली हथियार छोड़ चुके हैं। यह आंकड़ा बड़ा बदलाव दिखाता है। लोग अब डर से बाहर आ रहे हैं। सरकार की नीति पर भरोसा बढ़ रहा है। सुरक्षा बलों का व्यवहार भी इसमें मदद कर रहा है। लोग अब भविष्य को लेकर सोच रहे हैं। जंगलों में रहने के बजाय गांवों में लौट रहे हैं। यह स्थिति नई उम्मीद जगाती है। शांति की राह मजबूत होती दिख रही है।
क्या बस्तर अब शांति की ओर बढ़ रहा है?
बस्तर में हालात बदलते नजर आ रहे हैं। जहां पहले गोलियों की आवाज थी वहां अब बच्चों की हंसी सुनाई दे रही है। लोग खेती की ओर लौट रहे हैं। सड़कें बन रही हैं। स्कूल फिर से खुल रहे हैं। बाजारों में रौनक बढ़ रही है। जब नक्सली भी समाज में लौट रहे हैं तो भरोसा बन रहा है। यह पूरे इलाके के लिए अच्छा संकेत है। विकास की राह खुल रही है। लोग अब डर के बिना जीना चाहते हैं। यह शांति की नई शुरुआत कही जा सकती है।

























