जैसे ही मुंबई मेयर पद के लिए लॉटरी ड्रॉ में सामान्य महिला आरक्षण घोषित हुआ सियासी तापमान बढ़ गया। सदन में शोर हुआ। आरोप लगे। विपक्ष ने इसे निष्पक्ष प्रक्रिया के खिलाफ बताया। कहा गया कि फैसला जल्दबाजी में लिया गया। प्रतिनिधित्व का संतुलन बिगड़ा है। विरोध इतना तेज हुआ कि वॉकआउट तक की नौबत आ गई। अब यह सिर्फ आरक्षण नहीं बल्कि सत्ता की लड़ाई बन चुकी है।
शिवसेना सबसे आक्रामक क्यों दिखी?
उद्धव ठाकरे गुट की शिवसेना ने सीधे मोर्चा खोला। पार्टी का कहना है कि पहले कई कार्यकालों में मेयर पद अनारक्षित रहा। इस बार अचानक सामान्य महिला आरक्षण क्यों। पूर्व मेयर किशोरी पेडनेकर ने ओबीसी वर्ग की अनदेखी का आरोप लगाया। कहा गया कि लॉटरी सूची में ओबीसी नाम ही नहीं थे। पार्टी इसे साजिश मान रही है। मुंबई की सामाजिक संरचना की दुहाई दी जा रही है।
बीजेपी और शिंदे गुट कितने मजबूत?
संख्या बल की बात करें तो तस्वीर साफ है। बीएमसी में भाजपा और शिंदे गुट के पास बहुमत है। भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी है। शिंदे गुट के पास 29 पार्षद हैं। लंबे समय बाद ठाकरे परिवार का दबदबा टूटा है। सत्ता गठबंधन के हाथ में है। लेकिन मेयर पद पर सहमति आसान नहीं दिखती। अंदरूनी रस्साकशी खुलकर सामने आ रही है।
क्या गठबंधन के भीतर खटपट है?
सत्ता में होने के बावजूद तालमेल पर सवाल उठ रहे हैं। भाजपा स्पष्ट फॉर्मूला चाहती है। वहीं Eknath Shinde गठबंधन की एकता की बात कर रहे हैं। हाल ही में पार्षदों को होटल में ठहराने और फिर लौटाने की खबरें आईं। इसे दबाव की राजनीति कहा गया। मेयर पद अब गठबंधन की परीक्षा बन गया है। कुर्सी एक है और दावेदार कई।
आरक्षण सूची से हंगामा क्यों बढ़ा?
इस साल कई नगर निगमों में महिला आरक्षण लागू किया गया है। मुंबई भी उसी सूची में आई। पुणे नवी मुंबई नासिक जैसे शहरों में अलग अलग वर्गों को आरक्षण मिला। कहीं एससी तो कहीं ओबीसी आरक्षण हुआ। लेकिन मुंबई का सामान्य महिला होना विवाद की वजह बना। विपक्ष कहता है कि शहर की विविधता नजरअंदाज हुई। यही सवाल जनता भी पूछ रही है।
उद्धव ठाकरे गुट की अगली चाल क्या?
Uddhav Thackeray की शिवसेना इस मुद्दे को सड़कों तक ले जाने की तैयारी में है। पार्टी इसे मुंबई की अस्मिता से जोड़ रही है। कानूनी विकल्प भी टटोले जा रहे हैं। नेतृत्व साफ कर चुका है कि यह लड़ाई यहीं खत्म नहीं होगी। सदन के बाहर भी दबाव बनेगा। रणनीति लंबी लड़ाई की है।
अब मुंबई की ताजपोशी किसकी होगी?
फिलहाल तस्वीर धुंधली है। संख्या बल सत्ता पक्ष के साथ है। लेकिन सहमति के बिना फैसला मुश्किल है। विपक्ष विरोध में डटा है। Brihanmumbai Municipal Corporation का मेयर सिर्फ पद नहीं बल्कि ताकत का प्रतीक है। आने वाले दिनों में बैठकों का दौर चलेगा। समझौता होगा या टकराव बढ़ेगा। मुंबई फिलहाल सियासी इंतजार में खड़ी है।

























