सुप्रीम कोर्ट ने झारखंड हाईकोर्ट के वकील महेश तिवारी की अर्जी रद्द करते हुए साफ कहा कि अदालत की मर्यादा तोड़ने की सजा माफी से ही कम हो सकती है।
क्या मामले ने अदालती मर्यादा पर सवाल खड़े किए?
सुप्रीम कोर्ट में आया यह मामला सिर्फ एक वकील की अर्जी तक सीमित नहीं था। यह मामला अदालती मर्यादा, संयम और न्यायपालिका की इज्जत से जुड़ा हुआ था। महेश तिवारी पर आरोप था कि उन्होंने झारखंड हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान कार्यवाही में रुकावट डाली। ऐसे रवैये को कोर्ट ने गंभीरता से लिया। सुप्रीम कोर्ट ने साफ संदेश दिया कि अदालत में अहंकार की कोई जगह नहीं। न्याय प्रणाली संयम से ही चलती है।
16 अक्टूबर 2025 को असल में हुआ क्या था?
झारखंड हाईकोर्ट में 16 अक्टूबर 2025 को सुनवाई के दौरान महेश तिवारी ने अदालती कार्यवाही को रोका। उन्होंने कहा कि न्यायपालिका के कारण देश सड़ रहा है। इसके अलावा उन्होंने अदालत को अपनी हद में रहने की चेतावनी भी दी। ये बयान अदालती माहौल के लिए गंभीर माने गए। इस घटना की वीडियो सोशल मीडिया पर तेज़ी से फैल गई। इससे मामला और भड़क गया।
हाईकोर्ट ने तुरंत कौन सा रुख अपनाया?
वीडियो वायरल होने के बाद झारखंड हाईकोर्ट ने मामले को हल्का नहीं लिया। मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई में पांच जजों की बेंच बनाई गई। इस बेंच ने स्वतः तौर पर आपराधिक अवमानना की कार्यवाही शुरू की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ऐसा व्यवहार न्याय प्रणाली को नुकसान पहुंचाता है। यह कदम अदालती अनुशासन बचाने के लिए लिया गया।
सुप्रीम कोर्ट में वकील पक्ष से क्या दलील दी गई?
सुप्रीम कोर्ट में महेश तिवारी की तरफ से सीनियर वकील सिद्धार्थ दवे पेश हुए। उन्होंने कहा कि उनके मुवक्किल का अदालत का अपमान करने का कोई इरादा नहीं था। उन्होंने बताया कि तिवारी अपनी गलती मान रहे हैं। वकील ने कहा कि बिना शर्त माफी मांगने की तैयारी है। साथ ही यह भी बताया गया कि सोशल मीडिया पर वीडियो ने मामले को बड़ा बना दिया।
CJI सूर्यकांत ने क्यों दिखाई सख्ती?
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने सीधे शब्दों में पूछा कि माफी मांगने में समस्या क्या है। उन्होंने कहा कि वकील झारखंड हाईकोर्ट क्यों नहीं जा सकता, यह सोच जिद दिखाती है। CJI ने तंज करते हुए कहा कि वकील वहां जाकर यह नहीं कह सकता कि मैं सुप्रीम कोर्ट से हुक्म ले आया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अहंकार से नहीं, सम्मान से बात रखनी चाहिए।
जस्टिस बागची ने क्या चेतावनी दी?
जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि पेशेवर गुरूर अक्सर टकराव का कारण बनता है। उन्होंने जोर दिया कि न्यायपालिका के हर स्तर पर संयम बरकरार रहना जरूरी है। अदालत सिर्फ कानून नहीं, संस्कार भी सिखाती है। यह टिप्पणी मामले की गंभीरता दिखाती है।
अखीर सुप्रीम कोर्ट ने क्या फैसला दिया?
सुप्रीम कोर्ट ने अर्जी खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि महेश तिवारी झारखंड हाईकोर्ट जाकर बिना किसी शर्त के माफी मांगें। कोर्ट ने यह भी कहा कि हाईकोर्ट माफी पर सहानुभूति से विचार कर सकती है। यह फैसला साफ संदेश देता है कि अदालती मर्यादा सबसे ऊपर है।























