पाकिस्तान एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के दरवाजे पर पहुंच गया है। आर्थिक हालात इतने खराब हो चुके हैं कि उसे बाहरी मदद की जरूरत पड़ रही है। सरकार ने आईएमएफ के साथ लंबी बातचीत की। इसके बाद नई आर्थिक सहायता को मंजूरी दी गई। यह स्थिति बार-बार सामने आ रही है। इससे साफ है कि देश की अर्थव्यवस्था अभी भी कमजोर बनी हुई है।
इस बार कितनी रकम मिली?
इस बार पाकिस्तान को कुल 1.2 अरब डॉलर की आर्थिक मदद मंजूर हुई है। यह रकम दो अलग-अलग योजनाओं के तहत दी जाएगी। एक हिस्सा विस्तारित कोष सुविधा के अंतर्गत मिलेगा। दूसरा हिस्सा जलवायु से जुड़ी योजना के तहत दिया जाएगा। अंतिम मंजूरी के बाद यह राशि जारी होगी। इससे कुछ समय के लिए राहत जरूर मिलेगी, लेकिन यह स्थायी समाधान नहीं माना जा रहा।
आईएमएफ से कैसे बनी सहमति?
आईएमएफ और पाकिस्तान के बीच कई दौर की बातचीत हुई। फरवरी से मार्च तक चर्चा का सिलसिला चलता रहा। शुरुआत में कोई ठोस नतीजा नहीं निकल पाया था। बाद में बातचीत ऑनलाइन जारी रही। अंततः दोनों पक्ष एक समझौते पर पहुंचे। आईएमएफ ने समीक्षा को सफल बताया। इसके बाद इस आर्थिक पैकेज को मंजूरी दी गई। यह समझौता कई शर्तों के साथ किया गया है।
किन योजनाओं के तहत पैसा मिलेगा?
यह आर्थिक मदद दो प्रमुख योजनाओं के तहत दी जा रही है। पहली योजना ईएफएफ है, जो 37 महीनों की अवधि के लिए है। दूसरी योजना आरएसएफ है, जो 28 महीनों की अवधि की है। ईएफएफ के तहत लगभग 1 अरब डॉलर दिए जाएंगे। वहीं आरएसएफ के तहत करीब 21 करोड़ डॉलर मिलेंगे। इन दोनों योजनाओं का उद्देश्य अलग-अलग है, लेकिन मकसद अर्थव्यवस्था को संभालना है।
पाकिस्तान की हालत क्यों खराब है?
पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से दबाव में चल रही है। महंगाई और बढ़ते कर्ज ने हालात बिगाड़ दिए हैं। विदेशी निवेश में गिरावट आई है। सरकार को बार-बार कर्ज लेना पड़ रहा है। ऊर्जा क्षेत्र में भी कई समस्याएं बनी हुई हैं। सुधारों की गति धीमी है, जिससे संकट खत्म नहीं हो पा रहा।
क्या सुधारों से बदलेगी तस्वीर?
आईएमएफ की शर्तों में कई आर्थिक सुधार शामिल हैं। सरकार को खर्चों पर नियंत्रण रखना होगा। टैक्स व्यवस्था को मजबूत करना जरूरी होगा। ऊर्जा क्षेत्र में बदलाव लाने होंगे। बाजार में भरोसा बढ़ाना होगा। अगर ये सुधार सही तरीके से लागू हुए तो हालात सुधर सकते हैं। लेकिन इसे लागू करना आसान नहीं होगा।
आगे क्या रहेगा पाकिस्तान का रास्ता?
पाकिस्तान के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती खुद को संभालने की है। बार-बार बाहरी मदद लेने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं मिलेगा। आर्थिक नीतियों में बड़े बदलाव जरूरी हैं। अगर सुधार नहीं हुए तो संकट बना रहेगा। आने वाला समय तय करेगा कि पाकिस्तान इस मुश्किल दौर से निकल पाता है या नहीं।

























