बिजनेस न्यूज. मंगलवार को भारतीय रुपया अमेरिकी डॉलर के मुकाबले 84.76 के सर्वकालिक निचले स्तर पर पहुंच गया। यह गिरावट 4 पैसे की थी, जो सोमवार को हुए मूल्यह्रास के बाद आई। सोमवार को रुपया 13 पैसे कमजोर होकर 84.73 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर बंद हुआ था। विश्लेषकों के अनुसार, इस गिरावट का मुख्य कारण निराशाजनक व्यापक आर्थिक आंकड़े और वैश्विक बाजारों में डॉलर की मजबूती है। इसके अतिरिक्त, विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों द्वारा निरंतर निकासी और घरेलू अर्थव्यवस्था में कमजोर संकेतकों ने भी मुद्रा पर दबाव डाला।
डोनाल्ड ट्रम्प के BRICS देशों के खिलाफ बयानबाजी ने भी स्थिति को और बिगाड़ा। उन्होंने शनिवार को धमकी दी कि यदि BRICS समूह अमेरिकी डॉलर को कमजोर करने का प्रयास करेगा, तो उन पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाया जाएगा।
कारोबारी आंकड़े
सोमवार को रुपया 84.59 पर खुला और 84.73 के इंट्रा-डे लो पर पहुंच गया। मंगलवार को यह और कमजोर होकर 84.76 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर पहुंच गया। अंतरबैंक विदेशी मुद्रा बाजार में यह गिरावट वैश्विक बाजार में उतार-चढ़ाव के साथ तालमेल में थी।
आरबीआई की मौद्रिक नीति पर नज़र
बाजार सहभागियों की नजरें अब 6 दिसंबर को होने वाली आरबीआई की मौद्रिक नीति बैठक पर टिकी हैं। उम्मीद की जा रही है कि बैठक में मुद्रास्फीति और आर्थिक विकास के बीच संतुलन साधने पर चर्चा होगी।
वित्त राज्य मंत्री का बयान
वित्त राज्य मंत्री पंकज चौधरी ने संसद में कहा कि भू-राजनीतिक तनाव और अन्य प्रतिकूल परिस्थितियों के बावजूद रुपया एशिया की सबसे अच्छा प्रदर्शन करने वाली मुद्राओं में से एक बना हुआ है। उन्होंने कहा कि रुपये के अवमूल्यन का मुख्य कारण अमेरिकी डॉलर की मजबूती है। चौधरी के अनुसार, डॉलर सूचकांक इस वर्ष अब तक लगभग 4.8% बढ़ा है और 22 नवंबर को यह 108.07 के स्तर पर पहुंच गया, जो पिछले एक वर्ष का उच्चतम स्तर है।
भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रभाव
रुपये की इस गिरावट ने भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने कई चुनौतियां खड़ी कर दी हैं, जिनमें व्यापार घाटा और अंतरराष्ट्रीय बाजार में अस्थिरता मुख्य हैं। हालांकि सरकार का दावा है कि देश की मजबूत आर्थिक बुनियाद के कारण भारत इन चुनौतियों का सामना करने में सक्षम है। मुद्रा बाजार में आगे के रुझान को लेकर विशेषज्ञों का मानना है कि वैश्विक और घरेलू दोनों कारकों पर बारीकी से नजर रखना जरूरी है।























