भारत में इस समय कोयले का बड़ा भंडार जमा है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार खदानों में लगभग 100 मिलियन टन कोयला पड़ा है। थर्मल पावर प्लांटों के पास भी 21 दिन से ज्यादा का स्टॉक है। बिजली उत्पादन में हर दिन लगभग 20.5 लाख टन कोयला खर्च हो रहा है। लेकिन इस साल बिजली की मांग उम्मीद से कम रही है। बारिश लंबी चली और मौसम ठंडा रहा, जिससे एसी और कूलर की जरूरत घट गई। इसके साथ ही रिन्यूएबल एनर्जी का उत्पादन भी लगातार बढ़ता गया।
बिजली की मांग कम कैसे हुई?
सेंट्रल इलेक्ट्रिसिटी अथॉरिटी ने 2025 में बिजली की पीक मांग 277 गीगावॉट होने का अनुमान दिया था। लेकिन असल मांग 240 से 245 गीगावॉट के बीच ही रही। यह फर्क दिखाता है कि देश की ऊर्जा आदतें बदल रही हैं। घरेलू स्तर पर बिजली की बचत बढ़ी है। उद्योगों ने भी कई जगह ऊर्जा कुशल मशीनों का इस्तेमाल बढ़ाया। रिन्यूएबल स्रोतों के चलते थर्मल पावर की जगह कम होती गई। यह बदलाव बिना हड़बड़ी के धीरे-धीरे लेकिन स्थिरता के साथ आया है।
समय से पहले लक्ष्य कैसे पूरा?
भारत ने पेरिस समझौते में वादा किया था कि वह 2030 तक अपनी क्षमता का 50% गैर-जीवाश्म स्रोतों से ले आएगा। लेकिन यह लक्ष्य जुलाई 2025 में ही हासिल हो गया। सिर्फ दस साल में भारत की रिन्यूएबल क्षमता में पांच गुना बढ़ोतरी हुई है। 2014 में यह लगभग 35 गीगावॉट थी। जो अब बढ़कर 197 गीगावॉट से भी ज्यादा हो चुकी है। यह उपलब्धि दुनिया को दिखाती है कि भारत सिर्फ योजनाएँ नहीं बनाता, उन्हें पूरा भी करता है।
नई परियोजनाएं कहाँ चल रहीं?
देश में इस समय 169 गीगावॉट से ज्यादा की परियोजनाओं पर काम चल रहा है। साथ ही 65 गीगावॉट की परियोजनाओं के टेंडर जारी हो चुके हैं। गुजरात, राजस्थान और कर्नाटक रिन्यूएबल ऊर्जा के बड़े केंद्र बन चुके हैं। हाइब्रिड पावर सिस्टम से दिन और रात दोनों समय बिजली मिलेगी। ऑफशोर विंड प्रोजेक्ट समुद्र पर पवन चक्कियाँ लगाएंगे। पंप्ड हाइड्रो स्टोरेज से बिजली बचाकर जरूरत के समय इस्तेमाल होगी।
गांवों में सौर ऊर्जा कैसे पहुंच रही?
‘पीएम सूर्यघर योजना’ घरों की छतों पर सोलर पैनल लगवा रही है। इससे बिजली बिल लगभग खत्म हो जाता है। ‘पीएम कुसुम योजना’ किसानों के खेतों तक सोलर पंप पहुंचा रही है। इससे डीज़ल की जरूरत कम हुई और खर्च भी घटा। गाँवों में स्ट्रीट लाइटें सौर ऊर्जा से चलने लगी हैं। कई स्कूल और पंचायत भवन भी सौर बिजली से रोशन हैं। यह बदलाव सिर्फ शहरों तक सीमित नहीं रहा।
ग्रीन हाइड्रोजन से उद्योग कैसे बदलेंगे?
ग्रीन हाइड्रोजन मिशन बड़े उद्योगों को प्रदूषण मुक्त बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। इस गैस का इस्तेमाल स्टील, सीमेंट और ट्रांसपोर्ट सेक्टर में किया जाएगा। इससे कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी होगी। भारत वैश्विक स्तर पर ग्रीन फ्यूल सप्लायर बन सकता है। इससे रोजगार भी बढ़ेंगे। यह मिशन उद्योग और पर्यावरण दोनों के लिए फायदेमंद साबित होगा।
आगे का रास्ता कैसा दिखता है?
भारत की ऊर्जा यात्रा अब एक नए मोड़ पर है। कोयले पर निर्भरता घट रही है लेकिन अचानक समाप्त नहीं होगी। रिन्यूएबल क्षमता और बढ़ेगी, खासकर सोलर और विंड सेक्टर में। स्टोरेज तकनीक विकसित होने पर हरित ऊर्जा 24 घंटे उपलब्ध होगी। धीरे-धीरे प्रदूषण कम होगा और हवा साफ होगी। आने वाले पांच साल भारत को दुनिया की ऊर्जा क्रांति का नेतृत्व करते दिखा सकते हैं।

























