एक नए अध्ययन ने साफ कहा है कि कीटो डाइट भले शुरुआत में वजन घटाती है लेकिन इसे महीनों तक अपनाना शरीर के लिए भारी नुकसानदेह हो सकता है। यह डाइट कार्बोहाइड्रेट को लगभग खत्म कर देती है और ऊर्जा का मुख्य स्रोत सिर्फ चर्बी को बना देती है। कुछ हफ्तों में शरीर तेज़ी से वजन कम करता है लेकिन धीरे-धीरे शरीर पर लगातार चर्बी प्रोसेस करने का दबाव बढ़ जाता है। अध्ययन बताता है कि जब यह स्थिति लंबी होती है तो मेटाबॉलिज़्म की सामान्य कार्यप्रणाली टूटने लगती है। जो प्रक्रिया पहले शरीर को फायदा दे रही थी वही नुकसान करना शुरू कर देती है। यह बदलाव महीनों बाद नज़र आता है।
चर्बी का दबाव कैसे बढ़ता
शोधकर्ताओं ने पाया कि लगातार चर्बी प्रोसेस करते-करते शरीर की चर्बी संभालने की क्षमता कमजोर होने लगती है। शुरुआत में तो ब्लड शुगर कंट्रोल काफी बेहतर दिखता है लेकिन धीरे-धीरे ग्लूकोज़ और लिपिड मैनेजमेंट असंतुलित होने लगता है। शरीर चर्बी को तेज़ी से जलाता है लेकिन लगातार ऐसा करना उसकी प्राकृतिक प्रणाली को बाधित करता है। चर्बी की अधिकता की वजह से हार्मोनल संकेत भी बिगड़ जाते हैं। इस दौरान शरीर को ग्लूकोज़ संभालने में परेशानी आने लगती है। वैज्ञानिकों का कहना है कि शरीर एक स्तर के बाद इस डाइट को सामान्य तरीके से झेल नहीं पाता। इस वजह से अंदर ही अंदर समस्याएँ बढ़ने लगती हैं।
जिगर पर क्यों पड़ता सबसे ज्यादा असर
अध्ययन में नर चूहों में फाइब्रोसिस और फेटी लिवर बनने की प्रक्रिया बेहद तेज़ पाई गई जो इस बात का संकेत है कि जिगर लगातार बढ़ते दबाव को झेल नहीं पा रहा था। चर्बी का अधिक जमा होना जिगर की कोशिकाओं पर भारी असर डालता है जिससे भविष्य में शुगर और दिल की बीमारियों का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। शोध में पाया गया कि शरीर एक तय स्तर के बाद चर्बी को सामान्य रूप से पचा ही नहीं पाता। मादा चूहों में यह असर थोड़ा कम दिखा। इससे यह बात भी सामने आती है कि लिंग के आधार पर प्रतिक्रिया के परिणाम अलग हो सकते हैं। जिगर की यह समस्या कीटो डाइट का सबसे बड़ा छुपा खतरा बताई गई है।
ब्लड शुगर में कैसी गड़बड़ी
अध्ययन के अनुसार कीटो डाइट पर रहने वाले चूहों में वजन बढ़ा नहीं लेकिन ब्लड शुगर और इंसुलिन का संतुलन बिगड़ गया। उपवास के दौरान उनके ग्लूकोज़ और इंसुलिन स्तर सामान्य से काफी नीचे पाए गए। लेकिन जैसे ही उन्हें थोड़ी मात्रा में कार्बोहाइड्रेट दिया गया उनका शुगर स्तर अचानक बहुत तेज़ी से बढ़ गया। यह बढ़ोतरी काफी देर तक स्थिर नहीं हुई जिससे पता चलता है कि शरीर ने कार्बोहाइड्रेट संभालने की क्षमता ‘भूल’ ली थी। यह स्थिति इंसुलिन संवेदनशीलता पर गहरा असर डालती है। ऐसा असंतुलन भविष्य में डायबिटीज़ के खतरे को बढ़ा सकता है। यह संकेत बेहद गंभीर माने जा रहे हैं।
पैनक्रियास में क्या बिगड़ता
खोज में यह पाया गया कि पैनक्रियास के बीटा सेल लगातार बढ़ी हुई चर्बी के कारण तनाव में आ गए थे। इन कोशिकाओं का काम इंसुलिन बनाना होता है लेकिन जब इन पर दबाव बढ़ता है तो ये सामान्य प्रतिक्रियाएँ देना बंद कर देती हैं। वैज्ञानिकों को पता चला कि प्रोटीन प्रोसेसिंग में बाधा आने के कारण बीटा सेल ग्लूकोज़ पर सही प्रतिक्रिया नहीं दे पा रहे थे। इस स्थिति से शरीर की प्राकृतिक शुगर नियंत्रण प्रणाली प्रभावित होती है। यही वजह है कि छोटे कार्बोहाइड्रेट सेवन पर भी शुगर तेजी से बढ़ जाती है। जब चूहों को कीटो से हटाकर सामान्य भोजन दिया गया तब कुछ सुधार दिखा।
क्या इंसानों में भी ऐसा होगा
शोधकर्ता कहते हैं कि इंसानों और चूहों के शरीर में फर्क जरूर है लेकिन परिणाम यह संकेत देते हैं कि लंबे समय तक कीटो डाइट अपनाना सुरक्षित नहीं कहा जा सकता। अब तक हुए अधिकांश मानव अध्ययन सिर्फ शुरुआती फायदों पर केंद्रित रहे हैं जैसे वजन घटना या ब्लड शुगर कम होना। लेकिन दीर्घकालिक शोध बेहद कम हुए हैं। यह नया अध्ययन बताता है कि महीनों बाद शरीर पर इसके बिल्कुल उलटे प्रभाव पड़ सकते हैं। जिगर, पैनक्रियास और मेटाबॉलिज्म पर असर सीधे-सीधे इंसुलिन और शुगर नियंत्रण को प्रभावित कर सकता है। इसलिए इसे सावधानी के बिना अपनाना जोखिम भरा माना जा रहा है।
क्या सीख मिलती है इस अध्ययन से
शोधकर्ता यह नहीं कहते कि कीटो डाइट हमेशा खराब है बल्कि यह कि इसे लंबे समय तक अपनाना सभी के लिए सुरक्षित नहीं है। जल्दी वजन कम होने के नतीजे आकर्षक लगते हैं लेकिन इसके छिपे नुकसान कहीं ज्यादा गहरे हो सकते हैं। फेटी लिवर, असंतुलित ब्लड शुगर और बीटा सेल तनाव जैसी समस्याएँ आगे चलकर गंभीर बीमारियों का कारण बन सकती हैं। वैज्ञानिक सलाह दे रहे हैं कि कीटो को एक स्थायी जीवनशैली जैसा न अपनाया जाए। समय-समय पर संतुलित भोजन और डॉक्टर की सलाह जरूरी है। यह अध्ययन बताता है कि जल्द फायदे के पीछे भागना कभी-कभी भारी नुकसान दे सकता है।























