प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के सदस्य Sanjeev Sanyal ने रुपये की गिरावट को लेकर साफ कहा है कि उन्हें इसमें कोई बड़ी चिंता नहीं दिखती। उनका तर्क है कि तेज़ विकास दर वाली अर्थव्यवस्थाओं में मुद्रा का कमजोर होना एक सामान्य प्रक्रिया है। इसे आर्थिक तनाव या अस्थिरता का संकेत मानना सही नहीं होगा।
उच्च विकास और कमजोर मुद्रा का क्या संबंध है?
टाइम्स नेटवर्क इंडिया इकोनॉमिक कॉन्क्लेव 2025 में बोलते हुए सान्याल ने जापान और चीन का उदाहरण दिया। उन्होंने कहा कि जब जापान की अर्थव्यवस्था तेज़ी से बढ़ रही थी, उस समय उसकी विनिमय दर जानबूझकर कमजोर रखी गई। इसी तरह चीन ने 1990 और 2000 के दशक में विकास को बढ़ावा देने के लिए लंबे समय तक युआन को कमजोर बनाए रखा। बाद में परिस्थितियों के अनुसार उसे मज़बूत किया गया।
क्या कमजोर रुपया महंगाई बढ़ा रहा है?
सान्याल ने इस धारणा को भी खारिज किया कि रुपये की कमजोरी से घरेलू महंगाई बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि अगर मुद्रा की गिरावट से देश में महंगाई पैदा होती, तब चिंता की बात होती। लेकिन मौजूदा हालात में ऐसा नहीं हो रहा है। उनके शब्दों में, जब तक कमजोर रुपया घरेलू कीमतों पर दबाव नहीं डालता, तब तक इसे गंभीर खतरे के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
हाल के दिनों में रुपये में कितनी गिरावट आई?
इस महीने की शुरुआत में भारतीय रुपया डॉलर के मुकाबले 90 के स्तर को पार कर गया था। इसके बाद भारत-अमेरिका व्यापार समझौते को लेकर अनिश्चितता और लगातार विदेशी पूंजी के बाहर जाने के कारण मात्र 13 दिनों में रुपया 91 के स्तर के पार चला गया। यही तेज़ गिरावट बहस की बड़ी वजह बनी।
कमजोर रुपया: फायदा या नुकसान?
आमतौर पर माना जाता है कि कमजोर रुपया निर्यात के लिए फायदेमंद होता है। लेकिन हालिया रिसर्च इस धारणा पर सवाल उठा रही है। सिस्टेमैटिक्स रिसर्च के अनुसार, मुद्रा में गिरावट से सभी क्षेत्रों को बराबर फायदा नहीं मिलता। इलेक्ट्रॉनिक्स, केमिकल्स, मशीनरी और पेट्रोलियम उत्पादों के निर्यात को कुछ लाभ होता है, लेकिन आयात पर ज़्यादा निर्भरता के कारण लागत बढ़ जाती है। इससे व्यापार घाटा और बढ़ सकता है।
एसबीआई रिसर्च क्या कहती है?
SBI Research ने भी माना है कि रुपया व्यापार संतुलन के लिए कोई मज़बूत “शॉक एब्जॉर्बर” नहीं है। रिपोर्ट के मुताबिक, रुपये की गिरावट से निर्यात की प्रतिस्पर्धा बढ़ती है, लेकिन आयात की संरचना और कीमतों के प्रभाव के कारण कुल व्यापार संतुलन में बड़ा सुधार नहीं हो पाता। निर्यात और आयात की प्रतिक्रियाएं अक्सर एक-दूसरे को संतुलित कर देती हैं।
जेफरीज ने रुपये पर क्या आकलन दिया?
ब्रोकरेज फर्म Jefferies ने भी रुपये की गिरावट पर घबराने की जरूरत नहीं बताई है। जेफरीज का कहना है कि रुपया अब काफी हद तक अवमूल्यित हो चुका है और आगे इसमें ज़्यादा गिरावट की संभावना कम है। मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार, नियंत्रित चालू खाता घाटा और स्थिर बाहरी आर्थिक स्थिति इसके पीछे बड़े कारण बताए गए हैं।
तो फिर असली कन्फ्यूजन क्या है?
एक तरफ सरकार के आर्थिक सलाहकार और अंतरराष्ट्रीय ब्रोकरेज रुपये की कमजोरी को सामान्य प्रक्रिया बता रहे हैं। दूसरी तरफ रिसर्च रिपोर्ट्स इसके सीमित फायदे और संभावित जोखिमों की ओर इशारा कर रही हैं। यही वजह है कि रुपये की गिरावट को लेकर “चिंता करें या नहीं करें” की बहस अब भी जारी है। फिलहाल संकेत यही हैं कि कमजोर रुपया अपने आप में संकट नहीं, लेकिन उस पर नज़र रखना ज़रूरी है।

























