बॉलीवुड के मशहूर अभिनेता धर्मेंद्र के सोमवार को निधन की खबर सामने आई। जानकारी के मुताबिक, 89 साल की उम्र में उन्होंने दोपहर करीब 1 बजे अपने आवास पर अंतिम सांस ली। लुधियाना के साहनेवाल में जन्मे धर्मेंद्र का असली नाम धरम सिंह देओल था। फिल्म इंडस्ट्री में कदम रखने के बाद वे धर्मेंद्र नाम से लोगों के दिलों में बस गए। धर्मेंद्र का अपनी जन्मभूमि से खास लगाव है। वह अक्सर कहते थे कि उन्होंने पंजाब की धरती से कहीं ज़्यादा हासिल किया है। पंजाब की धरती ने उन्हें पहचान दी, वह आज भी इसी धरती के बेटे हैं। धर्मेंद्र जब भी लुधियाना जाते, अपने पैतृक गाँव साहनेवाल ज़रूर जाते। इस दौरान वह आसपास के लोगों से भी मिलते।
धरम सिंह देओल से धर्मेंद्र बनने का उनका सिनेमाई सफ़र भी लुधियाना से ही शुरू हुआ। मिनर्वा सिनेमा में दिलीप कुमार की एक फ़िल्म देखने के बाद उनके मन में अभिनय का सपना जगा और यही जुनून उन्हें लुधियाना से मुंबई ले आया।
धर्मेंद्र की पारिवारिक पृष्ठभूमि
धर्मेंद्र का परिवार पहले लुधियाना ज़िले के नसराली गाँव में रहता था, लेकिन उनके जन्म से पहले ही परिवार साहनेवाल आकर बस गया था। धर्मेंद्र का जन्म 8 दिसंबर 1935 को साहनेवाल में हुआ था। उनके पिता केवल किशन सिंह देओल सरकारी स्कूल लालतों में शिक्षक थे। धर्मेंद्र ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा भी सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल लालतों से ही प्राप्त की।
लुधियाना और फगवाड़ा में पढ़ाई की
धर्मेंद्र की शिक्षा लुधियाना और फगवाड़ा में हुई। जिस स्कूल में उन्होंने पढ़ाई की, वहाँ उनके पिता शिक्षक थे। उनके पिता अनुशासन के प्रति अक्सर सख्त रहते थे। धर्मेंद्र ने दसवीं कक्षा तक लालटन के सरकारी स्कूल में पढ़ाई की। इसके बाद, वे अपने चाचा के पास फगवाड़ा (कपूरथला ज़िला) चले गए और वहीं अपनी आगे की शिक्षा पूरी की।
लालटन सरकारी स्कूल के ‘चमकते सितारे’ बोर्ड पर धर्मेंद्र का नाम सबसे ऊपर दर्ज है। धर्मेंद्र ने 1945 में इस स्कूल में दाखिला लिया था। स्कूल के प्रिंसिपल प्रदीप शर्मा ने पुराने रिकॉर्ड में धर्मेंद्र का नाम ढूंढ निकाला और उसे स्कूल के ‘चमकते सितारे’ बोर्ड पर लिखवा दिया।
धर्मेंद्र की पसंदीदा मिठाई
धर्मेंद्र अक्सर अपने बचपन को याद करते हुए साहनेवाल के उन पलों को याद करते थे, जो उनकी ज़िंदगी में एक खास जगह रखते थे। दादा-दादी के साथ बिताए पल, साहनेवाल रेलवे स्टेशन की रौनक और खासकर साधु हलवाई की गाजर की बर्फी, वो कभी नहीं भूले। धर्मेंद्र कई बार कहा करते थे कि बचपन में साधु हलवाई की बर्फी उनकी सबसे पसंदीदा मिठाई थी और उसका स्वाद आज भी उनकी यादों में ताज़ा है। इन बातों पर बात करते हुए वो अक्सर भावुक भी हो जाते थे। उन्होंने कई कार्यक्रमों और मंचों पर साधु हलवाई की गाजर की बर्फी का ज़िक्र भी किया है।
एक धार्मिक स्कूल की प्रेम कहानी
धर्मेंद्र कुछ साल पहले लुधियाना के नेहरू सिद्धांत केंद्र में एक कार्यक्रम के दौरान अपने स्कूल के दिनों की यादें साझा करने आए थे। इस मौके पर उन्होंने सरकारी सीनियर सेकेंडरी स्कूल लालतों में बिताए पलों को याद किया और स्कूल के प्रति अपने प्यार की कहानी भी सुनाई।
धर्मेंद्र ने कहा कि वह दिल से लिखते हैं, दिमाग से कम। उन्होंने बताया कि जब वह छठी कक्षा में थे, तब उन्हें आठवीं कक्षा में पढ़ने वाली एक लड़की हमीदा से प्यार हो गया था। वह अक्सर उससे मिलने का कोई न कोई बहाना ढूँढ़ते और कॉपी लेकर उसके पास चले जाते। दोनों एक-दूसरे से खूब बातें करते और यही मासूम दोस्ती उनकी पहली प्रेम कहानी बन गई।
बंटवारे के बाद हमीदा पाकिस्तान चली गईं: धर्मेंद्र
धर्मेंद्र ने बताया कि जब यह दिलचस्प कहानी शुरू हुई, उसी समय देश का बंटवारा हो गया था। बंटवारे के बाद हमीदा अपने परिवार के साथ पाकिस्तान चली गईं और फिर कभी नज़र नहीं आईं। धर्मेंद्र ने बताया कि वह अक्सर खुद से कहा करते थे – धर्मा, यह तुम्हारे प्यार के मूड का पहला मासूम कदम था और इस मासूम कदम को तुम ज़िंदगी भर भूल जाओगे।


























