थ्रिलर के उस्ताद श्रीराम राघवन अपनी पहचान वाले स्लो-बर्न अंदाज़ में ‘इक्कीस’ लेकर आए हैं। कहानी धीरे धीरे आगे बढ़ती है। किरदारों की गहराई पर काफी वक्त दिया गया है। लेकिन पहले हिस्से में रफ्तार बहुत सुस्त हो जाती है। दर्शक कहानी के प्वाइंट तक पहुंचने का इंतजार करता रह जाता है। अगर आप तेज एक्शन की उम्मीद में हैं तो शुरुआत भारी लग सकती है। यह पेसिंग हर किसी के लिए नहीं है।
क्या एडिटिंग कहानी को उलझाती है?
फिल्म बार बार 1971 और 2001 के बीच छलांग लगाती है। मकसद अतीत और वर्तमान को जोड़ना है। लेकिन कट इतने अचानक हैं कि ध्यान टूटता है। इमोशनल फ्लो कई बार बीच में ही रुक जाता है। दर्शक को समझने में वक्त लगता है कि कहानी किस दौर में है। यह प्रयोग अच्छा है पर क्रियान्वयन कमजोर पड़ता है। एडिटिंग फिल्म को आसान नहीं रहने देती।
क्या संगीत असर छोड़ने में नाकाम रहता है?
श्रीराम राघवन की फिल्मों में संगीत अक्सर जान डाल देता है। लेकिन ‘इक्कीस’ यहां पीछे रह जाती है। बैकग्राउंड स्कोर माहौल बनाता है। पर गाने याद नहीं रहते। फिल्म खत्म होने के बाद कोई धुन मन में नहीं बजती। गाने कहानी का हिस्सा कम और बोझ ज्यादा लगते हैं। यह कमी फिल्म के प्रभाव को कमजोर करती है। संगीत भावनाओं को पूरी ताकत नहीं दे पाता।
क्या क्लाइमेक्स अधूरा महसूस होता है?
‘इक्कीस’ का अंत पारंपरिक नहीं है। न तो जीत का जश्न है। न ही जोरदार ट्रैजिक फिनाले। फिल्म एक सादे और शांत अंत पर रुक जाती है। यह यथार्थवादी है। लेकिन मास ऑडियंस को संतुष्टि नहीं देता। जिन्हें सीटियां बजाने वाला क्लाइमेक्स चाहिए, उन्हें निराशा हो सकती है। एंटी-क्लाइमेक्स का रिस्क यहां साफ दिखता है।
क्या ये फिल्म फ्रंट बेंचर्स के लिए नहीं?
यह फिल्म नारेबाजी नहीं करती। न दुश्मन को गालियां देती है। न ही भारी भरकम डायलॉगबाजी है। यही इसकी ईमानदारी है। लेकिन यही बात इसे मास दर्शकों से दूर भी कर देती है। यह फिल्म तालियां नहीं, खामोशी मांगती है। जो दर्शक सिर्फ एंटरटेनमेंट चाहते हैं, उनके लिए यह भारी पड़ सकती है। यह मैच्योर सिनेमा है।
क्या भावनात्मक गहराई ही बोझ बनती है?
फिल्म परमवीर चक्र विजेता अरुण खेत्रपाल की शहादत को श्रद्धांजलि देती है। इमोशंस सच्चे हैं। कहानी संवेदनशील है। धर्मेंद्र की मौजूदगी इसे भावुक बनाती है। लेकिन भावनाओं की अधिकता कहानी को हल्का नहीं रहने देती। हर दर्शक इस गहराई से जुड़ नहीं पाता। यही वजह है कि फिल्म सीमित वर्ग तक सिमट सकती है।
क्या ‘इक्कीस’ समझने की फिल्म है देखने की नहीं?
‘इक्कीस’ धमाकों से दूर एक शांत वॉर बायोपिक है। यह एक जवान शहीद को सच्ची श्रद्धांजलि है। साथ ही धर्मेंद्र जैसे दिग्गज की विदाई भी। लेकिन यह हर दर्शक के लिए नहीं बनी। जो इसकी संवेदना समझेगा, वही इससे जुड़ पाएगा। कम शब्दों में कहें तो फिल्म की ताकत ही इसकी सबसे बड़ी कमजोरी बन सकती है।
























