साल के आख़िरी दिनों में जब देश पीछे मुड़कर देखता है, तो 2025 सिर्फ़ उपलब्धियों का नहीं, विदाई का साल भी बनकर सामने आता है। इस वर्ष भारत ने उन चेहरों को खोया जिन्होंने दशकों तक हमारी सोच, भावनाओं और पहचान को गढ़ा। कोई परदे पर हीरो था, कोई शब्दों से दुनिया रचता था। उनकी अनुपस्थिति ने यह एहसास कराया कि संस्कृति केवल वर्तमान नहीं, स्मृति भी है। यह साल पीढ़ियों को जोड़ने वाली कड़ियों के टूटने का साल रहा।
जब ‘ही-मैन’ और ‘भारत कुमार’ चले गए?
हिंदी सिनेमा के मजबूत स्तंभों में गिने जाने वाले धर्मेंद्र का नवंबर में निधन हुआ। उन्होंने एक दौर को ताकत और भरोसे का चेहरा दिया। अप्रैल में मनोज कुमार का जाना सिनेमा के राष्ट्रवादी अध्याय का अंत लगा। ‘भारत कुमार’ सिर्फ़ नाम नहीं था, एक विचार था। दोनों कलाकार अलग रास्तों से चले, लेकिन देश के दिल में एक जैसी जगह बना गए।
संगीत की कौन सी आवाज़ें खामोश हो गईं?
सितंबर में ज़ुबीन गर्ग के निधन ने संगीत प्रेमियों को गहरे सदमे में डाल दिया। असम से मुंबई तक उनकी आवाज़ गूंजती रही। जून में शेफाली जरीवाला का अचानक जाना नई पीढ़ी के लिए झटका था। सोशल मीडिया पर शोक की लहर दिखी। संगीत और मंच दोनों ने अपने रंग खो दिए।
हंसी और अभिनय की दुनिया ने किसे खोया?
अक्टूबर में सतीश शाह का जाना टीवी और सिनेमा के लिए खालीपन छोड़ गया। उनकी कॉमिक टाइमिंग घर-घर तक पहुंची थी। उसी महीने आसrानी भी विदा हो गए। उन्होंने किरदारों को जीवंत बनाया। साधारण से दिखने वाले चेहरे में असाधारण यादें छोड़ दीं।
टीवी और परदे के मजबूत स्तंभ कौन थे?
टीवी के महाकाव्य युग की पहचान रहे पंकज धीर का अक्टूबर में निधन हुआ। ‘महाभारत’ का कर्ण आज भी दर्शकों की स्मृति में जीवित है। मई में मुकुल देव के जाने से इंडस्ट्री हैरान रह गई। वह हर भूमिका में सहज थे। परदा उनका घर था।
सिनेमा और रंगमंच की कौन सी विरासत टूटी?
फरवरी में तेलुगु सिनेमा की शताब्दी साक्षी कृष्णवेणी का निधन हुआ। उन्होंने कई पीढ़ियों को मंच दिया। सितंबर में कन्नड़ रंगमंच के अहम नाम यशवंत सरदेशपांडे चले गए। उनके जाने से क्षेत्रीय कला को बड़ा नुकसान हुआ। दिसंबर में हिंदी साहित्य की सबसे शांत और गहरी आवाज़ विनोद कुमार शुक्ल का निधन हुआ। उनके शब्द सरल थे, लेकिन अर्थ गहरे। साहित्य को उन्होंने शोर नहीं, संवेदना दी। उनके जाने से किताबों के बीच एक खामोशी उतर आई।
इन विदाइयों का मतलब क्या है?
2025 हमें यह याद दिलाकर गया कि कलाकार अमर होते हैं, शरीर नहीं। उनके काम हमारे साथ रहते हैं। यह साल शोक का था, लेकिन स्मृति का भी। भारत ने सिर्फ़ नाम नहीं खोए, बल्कि अपने सांस्कृतिक आईने के कई रंग खो दिए। अब जिम्मेदारी हमारी है कि उनकी रचनाओं को ज़िंदा रखें। यही सबसे सच्ची श्रद्धांजलि है।

























