नई दिल्ली, श्रीनगर में निकाले गए इस विशेष नगर कीर्तन में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान शामिल हुए। दोनों नेताओं ने संगत के बीच चलकर गुरु साहिब के चरणों में मत्था टेका। उन्होंने कहा कि यह उनके जीवन का सौभाग्य है कि ऐसी पवित्र घड़ी में दिए गए निमंत्रण पर वे उपस्थित हुए। कार्यक्रम पंजाब सरकार द्वारा आयोजित था और इसका उद्देश्य गुरु साहिब की विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाना बताया गया। वातावरण पूर्ण रूप से धार्मिक रहा और नेताओं ने खुद को श्रद्धालु के रूप में प्रस्तुत किया।
उमर अब्दुल्ला की मौजूदगी क्यों अहम रही?
जम्मू-कश्मीर के नेता उमर अब्दुल्ला भी नगर कीर्तन में शामिल हुए और उन्होंने भी गुरु घर में सिर झुकाया। उनकी मौजूदगी ने कार्यक्रम को पंजाब और दिल्ली तक सीमित नहीं रहने दिया बल्कि कश्मीर की भूमि पर भी शहादत को सम्मान मिला। स्थानीय लोगों ने भी उनका अभिवादन किया। उन्होंने कहा कि गुरु तेग बहादुर जी का बलिदान मानवता के लिए मिसाल है और इसे राजनीति से ऊपर रखकर याद किया जाना चाहिए।
कार्यक्रम का माहौल कैसा रहा?
ढोल नगाड़ों, कीर्तन और अरदास के साथ नगर कीर्तन का माहौल बेहद भावुक और श्रद्धापूर्ण रहा। हजारों श्रद्धालु संगत के साथ चलते दिखे। बच्चों, बुजुर्गों और साधारण परिवारों के साथ सुरक्षाकर्मी भी मौजूद रहे। मंच से किसी ने नफरत की बात नहीं की बल्कि सभी ने प्रेम, भाईचारे और एकता की सीख दी। पूरा आयोजन यह संदेश देता दिखा कि धार्मिक कार्यक्रमों से भी समाज को जोड़ने का काम किया जा सकता है।
गुरु साहिब की शहादत आज क्यों जरूरी?
इतिहास में दर्ज है कि गुरु तेग बहादुर जी ने कमजोरों और मजहबी आज़ादी की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर कर दिए। केजरीवाल ने कहा कि उनकी कहानी हर बच्चे तक पहुंचनी चाहिए। आज के दौर में जब नफरत और हिंसा दिखाई देती है, तब गुरु साहिब की सीख समाज को जोड़ने और नकारात्मक सोच को हराने में मददगार हो सकती है। भगवंत मान ने कहा कि पंजाब सरकार का दायित्व है कि वह इस विरासत को आगे बढ़ाए।
क्या यह केवल धार्मिक आयोजन था?
हालांकि नगर कीर्तन मूल रूप से धार्मिक कार्यक्रम था, लेकिन इसका असर सामाजिक और राजनीतिक दोनों रूपों में दिखा। नेताओं ने भीड़ के बीच जाकर लोगों से हाथ मिलाए और खुद को साधारण श्रद्धालु की तरह प्रस्तुत किया। विरोधी इसे राजनीतिक प्रयास बता सकते हैं, लेकिन वहां मौजूद लोगों ने इसे भावनात्मक क्षण माना। इस कार्यक्रम का उद्देश्य आस्था के साथ-साथ इंसानियत का संदेश देना भी रहा।
आगे आनंदपुर साहिब में क्या होगा?
यह जत्था श्रीनगर से रवाना होकर 22 नवंबर को आनंदपुर साहिब पहुंचेगा। वहां कीर्तन दरबार, लंगर और विशेष कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे। विभिन्न इलाकों से संगत वहां आएगी और गुरु साहिब की शहादत को याद करेगी। सरकार ने इसे ऐतिहासिक स्तर पर मनाने की तैयारी की है। कार्यक्रम कई दिनों तक चलेगा और इसे आध्यात्मिक यात्रा के रूप में देखा जा रहा है।
आम लोगों के लिए इससे क्या सीख?
यह आयोजन तभी सफल माना जाएगा जब आम लोगों को गुरु साहिब की सीख अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा मिले। यदि कोई किसान, दुकानदार या छात्र घर लौटकर यह सोचता है कि सच और इंसानियत के लिए खड़ा होना जरूरी है, तो यही इस शताब्दी की असली जीत होगी। गुरु तेग बहादुर जी का संदेश यही है कि सिर कट सकता है लेकिन सच के सामने झुकना नहीं चाहिए।























