हरपाल सिंह चीमा ने कहा कि अगर अमेरिका से सस्ता दूध पाउडर और अनाज भारत आने लगा तो पंजाब का किसान कैसे टिकेगा। मंडियों में दाम टूटेंगे। स्थानीय फसलों की मांग घटेगी। किसान पहले ही कर्ज में है। ऐसे में मुकाबला और कठिन होगा। यही सबसे बड़ी चिंता है। चीमा ने याद दिलाया कि पंजाब के किसानों ने दशकों तक देश का पेट भरा। गेहूं और धान से राष्ट्रीय भंडार मजबूत किया। पिछले पचास सालों में बड़ा योगदान दिया। आज भी वही किसान खेत में पसीना बहा रहा है। फिर उसी को जोखिम में क्यों डाला जा रहा है। यही सवाल बार-बार उठाया जा रहा है।
क्या केंद्र ने झुककर समझौता किया?
चीमा ने आरोप लगाया कि केंद्र सरकार ने अमेरिका के सामने झुककर यह डील की। उनका कहना है कि यह बराबरी का सौदा नहीं दिखता। एक तरफ टैरिफ कम किए गए। दूसरी तरफ भारतीय उत्पादों पर दबाव बना रहा। इससे संदेह बढ़ा है। क्या देशहित से समझौता हुआ है।
क्या अमेरिकी बयान ने सच्चाई खोली?
चीमा ने अमेरिकी कृषि सचिव के ट्वीट का हवाला दिया। उसमें इस डील पर खुशी जताई गई। कहा गया कि अमेरिकी निर्यात बढ़ेगा। ग्रामीण अमेरिका को फायदा होगा। अर्थव्यवस्था मजबूत होगी। चीमा का कहना है कि इससे साफ है लाभ किसे होगा। भारतीय किसान को या अमेरिकी किसान को।
क्या पंजाब भाजपा जवाब देगी?
चीमा ने सुनील जाखड़ पर भी निशाना साधा। उन्होंने कहा कि अगर डील फायदेमंद है तो पूरा ड्राफ्ट सार्वजनिक किया जाए। लोगों को सच्चाई बताई जाए। अमेरिकी बयान का स्पष्ट जवाब दिया जाए। यह सीधी राजनीतिक चुनौती है। अब सबकी नजर भाजपा के रुख पर है।
क्या टैरिफ के आंकड़े चिंता बढ़ाते हैं?
चीमा ने कहा कि पहले भारतीय उत्पादों पर ज्यादा टैरिफ लगता था। अब कुछ बदलाव हुए हैं। दूसरी तरफ अमेरिकी उत्पादों के लिए रास्ता आसान हुआ। उन्होंने आंकड़ों के साथ बात रखी। उनका कहना है कि यह संतुलित समझौता नहीं लगता। इससे असमानता का भाव पैदा होता है। चीमा ने खुली बहस की चुनौती दी। कहा कि कोई भी नेता सामने आकर चर्चा कर सकता है। दस्तावेज जनता के सामने रखे जाएं। किसानों के भविष्य से खिलवाड़ नहीं होने दिया जाएगा। यह मुद्दा अब और गर्म होगा। आने वाले दिनों में सियासत और तेज दिख सकती है।
























