खामेनेई को लेकर भावनात्मक बयान सामने आ रहे हैं। कुछ लोग उन्हें भारत का पुराना सहयोगी बता रहे हैं। लेकिन उनके पुराने बयानों को देखें तो तस्वीर सीधी नहीं है। उन्होंने कई बार कश्मीर मुद्दे पर बयान दिए। 2017 में उन्होंने मुस्लिम देशों से कश्मीर के मुसलमानों के समर्थन की अपील की थी। भारत ने इसे अपने आंतरिक मामलों में दखल माना। ऐसे बयानों से दोनों देशों के बीच असहजता बढ़ी। इसलिए दोस्ती का सवाल विवादित है।
क्या कश्मीर और CAA पर बयान से रिश्ते बिगड़े?
2019 में जब भारत ने अनुच्छेद 370 हटाया तो खामेनेई ने इसकी आलोचना की। भारत ने नाराजगी जताते हुए ईरानी राजदूत को तलब किया। 2020 में नागरिकता संशोधन कानून के विरोध के दौरान भी उन्होंने भारत पर टिप्पणी की। सोशल मीडिया पर उनके शब्द कड़े थे। भारत सरकार ने इन टिप्पणियों को सिरे से खारिज किया। इन घटनाओं से साफ है कि रिश्ते हमेशा सहज नहीं रहे। रणनीतिक संबंध थे, लेकिन राजनीतिक मतभेद भी मौजूद थे।
भारत की चुप्पी का मतलब क्या है?
भारत की मौजूदा चुप्पी को अलग-अलग नजर से देखा जा रहा है। कुछ लोग इसे कमजोरी कह रहे हैं। कुछ इसे समझदारी भरा कदम बता रहे हैं। खाड़ी देशों में करीब 90 लाख भारतीय रहते हैं। ये देश भारत के लिए ऊर्जा और व्यापार के लिहाज से बेहद अहम हैं। इनमें से कई देशों के ईरान से रिश्ते तनावपूर्ण हैं। ऐसे में भारत को संतुलन बनाकर चलना पड़ता है। विदेश नीति अक्सर सार्वजनिक बयान से ज्यादा पर्दे के पीछे चलती है।
क्या खाड़ी देश ज्यादा महत्वपूर्ण हैं?
भारत ने हाल के वर्षों में सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, कतर, ओमान, कुवैत और बहरीन के साथ मजबूत संबंध बनाए हैं। ये देश भारत के बड़े व्यापारिक और ऊर्जा साझेदार हैं। लाखों भारतीय वहां काम करते हैं। अगर क्षेत्र में युद्ध या अस्थिरता बढ़ती है तो इसका असर सीधे भारतीय परिवारों पर पड़ता है। ईरान के साथ व्यापार पर पहले से प्रतिबंधों का असर है। इसलिए नीति तय करते समय सरकार व्यापक हितों को देखती है।
मुस्लिम देशों की प्रतिक्रिया कैसी रही?
मुस्लिम देशों की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं रही। इस्लामिक सहयोग संगठन के सभी सदस्य देशों ने खुलकर शोक नहीं जताया। कुछ देशों ने हमले की निंदा की। कुछ ने संतुलित बयान दिया। इससे साफ है कि मुस्लिम दुनिया भी इस मुद्दे पर एकमत नहीं है। ईरान को सभी देशों का खुला समर्थन नहीं मिला। क्षेत्रीय राजनीति जटिल है और हर देश अपने हित के अनुसार फैसला ले रहा है।
क्या यह पूरी तरह भू-राजनीतिक रणनीति है?
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत का रुख पूरी तरह रणनीतिक सोच पर आधारित है। सरकार पश्चिम एशिया में स्थिरता चाहती है। वह अमेरिका और इजरायल से अपने रिश्ते मजबूत रखना चाहती है। साथ ही ईरान से संवाद भी पूरी तरह खत्म नहीं करना चाहती। यह संतुलन नई बात नहीं है। भारत लंबे समय से बहुपक्षीय नीति अपनाता रहा है। मौजूदा चुप्पी अस्थायी भी हो सकती है। लेकिन स्पष्ट है कि विदेश नीति भावनाओं से ज्यादा राष्ट्रीय हित पर टिकी होती है।
देश में बहस जारी है। विपक्ष नैतिक रुख की मांग कर रहा है। सरकार कह रही है कि भारत पहले अपने हित देखेगा। अयातुल्ला अली खामेनेई एक अहम क्षेत्रीय नेता थे। लेकिन भारत की विदेश नीति किसी एक व्यक्ति पर निर्भर नहीं करती। पश्चिम एशिया में अनिश्चित हालात के बीच भारत फिलहाल सावधानी की राह पर चलता दिखाई दे रहा है।
























