सुबह स्टेडियम के बाहर लंबी कतारें दिखीं। गांवों से ट्रॉली भरकर लोग आए। युवाओं में खास उत्साह था। परिवार बच्चों के साथ पहुंचे। ढोल की आवाज गूंजती रही। स्टेडियम पूरा भर गया। माहौल मेले जैसा लग रहा था। दूर-दूर से आए लोग अपने साथ गांव की खुशबू भी लेकर पहुंचे थे। कई बुजुर्ग पुराने दिनों की यादें साझा करते दिखे। बच्चों की आंखों में जिज्ञासा और चमक साफ नजर आ रही थी।
क्या बैलगाड़ी दौड़ ने दिल जीत लिया?
बारह साल बाद दौड़ फिर शुरू हुई। गाड़ियां मैदान में उतरीं। तालियां गूंजीं। मिट्टी उड़ती रही। बैल तेजी से दौड़े। दर्शक खड़े होकर देखने लगे। यह सिर्फ खेल नहीं, परंपरा की वापसी थी। युवाओं ने मोबाइल में हर पल कैद किया। बुजुर्गों के चेहरों पर गर्व झलक रहा था। मैदान का जोश देर तक थमता नहीं दिखा।
क्या पारंपरिक खेल चमके?
हॉकी मुकाबले हुए। कबड्डी के दांव चले। 100 मीटर दौड़ हुई। गोला फेंक भी हुआ। रस्साकशी ने जोश बढ़ाया। बाजीगर शो ने बच्चों को खुश किया। हर कोना खेल से भरा था। खिलाड़ियों ने पूरी ताकत झोंक दी। दर्शकों ने हर मुकाबले पर तालियां बजाईं। गांव की खेल संस्कृति फिर जीवंत हो उठी।
क्या नेताओं ने संदेश दिया?
स्पीकर कुलतार सिंह संधवां मंच पर आए। उन्होंने इसे ऐतिहासिक दिन बताया। कानून में बदलाव से यह संभव हुआ। युवाओं को मैदान में आने को कहा। मोबाइल कम चलाने को कहा। नशे से दूर रहने की अपील की। परंपरा बचाना जरूरी है। उन्होंने खेलों को नई पीढ़ी की ताकत बताया। संगत से एकजुट रहने की अपील की। पंजाब की शान को बचाए रखने की बात कही।
क्या सरकार ने नई दिशा दी?
राज्य मीडिया प्रमुख बलतेज सिंह पन्नू ने आयोजन की सराहना की। उन्होंने कहा यह पहचान का प्रतीक है। मुख्यमंत्री के विजन से इसे ताकत मिली। सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा गया। लोगों के चेहरों पर खुशी थी। ग्रामीण ओलंपिक फिर चमक उठा। प्रशासन ने हर स्तर पर निगरानी रखी। व्यवस्था में किसी तरह की ढिलाई नहीं दिखी। आयोजन को बड़ी सफलता बताया गया।
क्या यह परंपरा जारी रहेगी?
डीसी और अधिकारी मौजूद रहे। व्यवस्था ठीक रही। भीड़ ज्यादा थी पर नियंत्रण रहा। लोग संतुष्ट दिखे। उम्मीद जताई गई कि यह आयोजन जारी रहेगा। किला रायपुर फिर चर्चा में है। यह असली पंजाब की तस्वीर है। बुजुर्गों ने इसे गौरव का दिन कहा। युवाओं ने अगले साल फिर आने का संकल्प लिया। गांव की यह रिवायत अब नई उम्मीद जगा रही है।
























