अबोहर में जन्मी चार महीने की दिलजोत की हालत गंभीर थी। उसे जन्म से दिल में छेद और संक्रमण था। माता-पिता उसे इलाज के लिए बठिंडा ले गए। खर्च बहुत ज्यादा था। लेकिन योजना से मदद मिली। बच्ची को चौबीस घंटे निगरानी में रखा गया। इलाज सही समय पर मिला। परिवार को पैसों की चिंता नहीं करनी पड़ी।
क्या परिवार पर खर्च नहीं आया?
दिलजोत के पिता भारत कुमार छोटा सैलून चलाते हैं। डॉक्टरों ने दिल में छेद बताया। इलाज दो अस्पतालों में हुआ। कुल खर्च ₹2.77 लाख था। लेकिन पूरा पैसा योजना में कवर हो गया। परिवार को कुछ नहीं देना पड़ा। यह उनके लिए बड़ी राहत थी। अब वे बेटी की सेहत पर ध्यान दे रहे हैं।
क्या सरकार ने वादा निभाया?
भगवंत सिंह मान ने कहा था कि इलाज की चिंता करो, बिल की नहीं। अब यह बात सच लग रही है। सरकार मरीजों के साथ खड़ी दिख रही है। गरीब परिवारों को सीधी मदद मिल रही है। लोग बिना डर इलाज करा रहे हैं। इससे भरोसा बढ़ा है।
क्या ₹10 लाख तक इलाज मिलता?
इस योजना के तहत हर मां और नवजात को ₹10 लाख तक का कैशलेस इलाज मिलता है। सरकारी और प्राइवेट दोनों अस्पताल शामिल हैं। जन्म के पहले घंटों से इलाज शुरू हो सकता है। इससे समय पर इलाज होता है। गंभीर बीमारियों का खतरा कम होता है। परिवार आर्थिक बोझ से बचता है।
क्या हजारों बच्चों को फायदा मिला?
स्वास्थ्य मंत्री डॉ. बलबीर सिंह ने बताया कि गांवों में जागरूकता बढ़ाई जा रही है। पिछले तीन महीनों में 6000 से ज्यादा नवजातों का इलाज हुआ। योजना तेजी से फैल रही है। कम वजन, संक्रमण और अन्य समस्याओं का इलाज हो रहा है। इससे बच्चों की जान बच रही है।
क्या और भी उदाहरण सामने आए?
बठिंडा के एक अस्पताल में एक नवजात का इलाज हुआ। उसे पीलिया और सांस की समस्या थी। करीब ₹1 लाख का खर्च था। लेकिन पूरा खर्च योजना में कवर हुआ। पटियाला के मनकीरत सिंह का भी इलाज हुआ। उनके पिता ने कहा कि वे परेशान थे। लेकिन योजना ने राहत दी।
क्या अब लोगों का भरोसा बढ़ा?
अब पंजाब में लोग जल्दी अस्पताल पहुंच रहे हैं। जन्म के पहले 72 घंटों में इलाज हो रहा है। इससे बीमारी कम बढ़ रही है। सरकार सेहत कार्ड बनवाने को कह रही है। कैंप लगाए जा रहे हैं। लोग तेजी से जुड़ रहे हैं। यह योजना जमीन पर असर दिखा रही है।

























