पंजाब न्यूज. कई गाँवों में बच्चे बिना पूरा खाना खाए स्कूल पहुंचते हैं। भूखे पेट बच्चा पढ़ाई पर ध्यान नहीं लगा पाता। जब उसे स्कूल में गरम और अच्छा खाना मिलता है, उसका मन पढ़ाई में लगता है। टीचर बताते हैं कि खाना खाने के बाद बच्चे ज्यादा शांत और सक्रिय रहते हैं। पोषण मिलने से बच्चे कम बीमार पड़ते हैं, जिससे स्कूल में उपस्थिति भी सुधरती है। यह योजना सिर्फ थाली भरने के लिए नहीं, बच्चों का भविष्य मजबूत करने के लिए है। सरकार चाहती है कि शिक्षा और पोषण एक साथ चलें ताकि हर बच्चा आगे बढ़ सके।
अब यूकेजी बच्चे भी शामिल
पहले यूकेजी यानी छोटे बच्चों को यह खाना नहीं मिलता था। अब सरकार ने लगभग दो लाख यूकेजी बच्चों को इस योजना में शामिल कर लिया है। ये छोटे बच्चे तेजी से बढ़ने की उम्र में होते हैं, उनके शरीर और दिमाग को सही पोषण की ज़रूरत होती है। कई बच्चे सुबह खाना खाए बिना ही स्कूल आ जाते थे। अब स्कूल में उन्हें खाना मिलता है तो वे सुरक्षित और संभाले हुए महसूस करते हैं। परिवारों को भी यह भरोसा रहता है कि बच्चे को कम से कम एक अच्छा भोजन रोज़ मिलेगा। इससे परिवार की चिंता और खर्च दोनों कम होते हैं।
सप्ताह में एक दिन फल क्यों?
सरकार ने बच्चों को हफ्ते में एक दिन मौसमी फल देना शुरू किया है। शुरुआत में केले दिए गए, बाद में किन्नू और गाजर भी जोड़े गए। फल शरीर को जरूरी विटामिन और ताकत देते हैं। मौसमी फल ताज़े होते हैं और पंजाब में आसानी से मिल जाते हैं। इससे किसान भी खुश हैं क्योंकि फल की खरीद स्थानीय बाजार से होती है। मतलब एक योजना से बच्चों को पोषण और किसानों को काम, दोनों को फायदा मिलता है। यह छोटा कदम बड़े असर वाला है।
नया साप्ताहिक मेन्यू क्या बदला?
पोषण विशेषज्ञों की मदद से नया मेन्यू बनाया गया है। इसमें दाल, राजमा, चावल, रोटी, सब्जी और खिचड़ी जैसी चीज़ें शामिल हैं। कोशिश यह है कि बच्चे को प्रोटीन, विटामिन और ताकत सब कुछ मिले। बच्चे खाना स्वाद लेकर खा रहे हैं और पेट भरने तक खा पा रहे हैं। टीचर बताते हैं कि भोजन के बाद बच्चों का ध्यान पढ़ाई में बढ़ गया है। इससे साफ दिखता है कि सही भोजन, सही पढ़ाई की नींव है। छोटे बदलाव बच्चों की पूरी दिनचर्या बदल देते हैं।
नाश्ता योजना का प्रस्ताव क्या है?
सरकार एक नई नाश्ता योजना भी लाने पर विचार कर रही है। कई बच्चे सुबह बिल्कुल खाली पेट स्कूल आते हैं। अगर उन्हें सुबह हल्का और पौष्टिक नाश्ता दिया जाए तो वे पहली ही क्लास से बेहतर ध्यान लगा पाएंगे। तमिलनाडु में यह योजना पहले से चल रही है और उसके अच्छे नतीजे आए हैं। पंजाब भी इस दिशा में आगे बढ़ सकता है। अगर यह योजना लागू हुई तो और भी महिलाएँ खाना बनाने के काम में जुड़ सकेंगी। यानी पढ़ाई, पोषण और रोज़गार—तीनों में सुधार।
स्कूल की रसोई की असली ताकत कौन?
पंजाब में लगभग 44,301 महिलाएँ मिड-डे मील पकाती हैं। इनके लिए यह सिर्फ नौकरी नहीं, गरिमा और सम्मान का रास्ता है। बच्चे इन्हें “स्कूल माँ” या “पकाने वाली आंटी” कहते हैं। वे सुबह सबसे पहले स्कूल पहुँचती हैं और बच्चों के लिए खाना प्यार से बनाती हैं। कई महिलाएँ 20–30 साल से सेवा दे रही हैं। गाँव उन पर भरोसा करता है, बच्चे उन पर प्यार करते हैं। यह सिर्फ काम नहीं, यह भावनात्मक जुड़ाव है।
क्या इन्हें बेहतर मेहनताना मिलना चाहिए?
इन महिलाओं को लगभग 3000 रुपए महीना मिलता है, जो मेहनत के हिसाब से कम है। सरकार ने केंद्र सरकार से इनके मेहनताना बढ़ाने की मांग की है। इनके लिए बीमा और सुरक्षित रसोई की सुविधा भी जरूरी है। अगर इन्हें मजबूत किया गया, तो पूरी योजना मजबूत हो जाएगी। आखिरकार, ये वही हाथ हैं जो पंजाब के बच्चों का भविष्य पकाते हैं। इनके सम्मान में ही बच्चों का कल सुरक्षित है।

























