पंजाब में पिछले कुछ सालों से पराली साड़ने को लेकर चिंता बढ़ी थी, क्योंकि इससे हवा खराब होती थी और उत्तर भारत में स्मॉग फैलता था। लेकिन इस बार तस्वीर बदल गई। आंकड़े बताते हैं कि 2021 में जहां 71,300 घटनाएं हुई थीं, वहीं 2024 में यह घटकर सिर्फ 10,900 रह गईं। इस बदलाव के पीछे सिर्फ आदेश नहीं, बल्कि किसानों की सोच में आया असली परिवर्तन है। किसानों ने महसूस किया कि हवा उनकी भी है, और खेत भी उनके अपने। सरकार ने किसानों को दोषी नहीं बताया, बल्कि उन्हें समाधान का साथी बनाया। यह बदलाव सिर्फ नीतियों का नहीं, मानसिकता का है।
किसने बनाई नई राह
मौजूदा सरकार ने किसानों से बातचीत, प्रशिक्षण और योजनाबद्ध काम किया। किसानों को पराली बेचने, सहेजने और उपयोग में लाने के तरीके बताए गए। पराली को अब कचरा नहीं, एक संसाधन माना जाने लगा है। सरकार ने गांव-स्तर पर मशीनें पहुंचाईं, खेतों में खेत प्रबंधन की तकनीकें सिखाईं। किसानों ने भी इस बदलाव को अपनाया क्योंकि इससे उन्हें अतिरिक्त आय मिलने लगी। यह पहली बार हुआ कि किसान खुद बदलाव की अगुवाई करते दिखे। जो सरकारी कागजों में नीति थी, वह ज़मीन पर मॉडल बन गई।
पराली से बन रहा ईंधन क्यों
थर्मल प्लांटों में पराली से बने बायोमास को कोयले के साथ जलाया जाने लगा है। इससे कोयले की खपत कम हुई और प्रदूषण भी कम हुआ। राज़पुरा थर्मल प्लांट का यह मॉडल अब अन्य राज्यों में भी देखा जा रहा है। पराली जो पहले बेकार थी, अब आय का स्रोत है। किसान खुद इसे इकट्ठा कर बेच रहे हैं। सरकार ने भंडारण केंद्र और परिवहन व्यवस्था तैयार की। इस मॉडल ने पर्यावरण और अर्थव्यवस्था दोनों को संतुलित किया।
किसान कैसे बने नायक
पहले जब पराली जलती थी, तो उंगली किसान पर उठती थी। लेकिन असलियत यह थी कि किसान के पास विकल्प नहीं था। जब विकल्प दिया गया, किसान ने साबित कर दिया कि वह समाधान देने वाला है, समस्या पैदा करने वाला नहीं। किसान ने मेहनत, धैर्य और समझदारी दिखाई। उन्होंने अपनी ज़मीन को सिर्फ भोजन का स्रोत नहीं, बल्कि प्रकृति की विरासत माना। इस बदलाव को लेकर अब राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा हो रही है। किसान अपने काम पर गर्व कर रहे हैं।
केंद्र सरकार ने क्यों की तारीफ
जब CAQM के चेयरमैन राज़पुरा प्लांट पहुंचे, तो वहाँ चेतावनी देने नहीं, बल्कि ताली बजाने का समय था। उन्होंने इसे “पराली क्रांति” कहा। यह वह पल था जब किसान, राज्य सरकार और केंद्र सरकार एक ही लक्ष्य पर एक साथ दिखे। इस तालमेल ने दिखाया कि विकास और पर्यावरण साथ-साथ चल सकते हैं। तारीफ सिर्फ शब्दों में नहीं, बल्कि एक मान्यता थी कि पंजाब ने असंभव को संभव किया। यह उस भरोसे की जीत थी जो किसान और प्रशासन के बीच बना रहा।
दीवाली का आसमान क्यों साफ दिखा
हर साल दीवाली के वक्त दिल्ली और उत्तर भारत का आसमान धुंध से भर जाता था। लेकिन इस साल तस्वीर अलग रही। हवा साफ महसूस हुई। लोग हैरान थे कि समाधान इतना मुश्किल भी नहीं था। असल फर्क नीयत और सहयोग ने पैदा किया। पंजाब ने देश को संदेश दिया कि बदलाव आदेश से नहीं, साझेदारी से आता है। यह बदलाव आने वाले वर्षों की दिशा तय करेगा।
आगे क्या होना चाहिए
अब यह मॉडल सिर्फ पंजाब तक सीमित नहीं रहना चाहिए। देश के बाकी राज्यों को भी इससे सीख लेनी चाहिए। किसानों को साथ लेकर चलने से समाधान स्थायी होते हैं। पर्यावरण संरक्षण तभी सफल होता है, जब जमीन पर खड़ा व्यक्ति इसमें हिस्सा ले। यह कहानी सिर्फ पराली की नहीं, सोच की है। पंजाब ने दिखाया कि परिवर्तन तभी होता है, जब लोग खुद बदलाव बनने का फैसला कर लें। यह भारत के लिए एक नई शुरुआत है।

























