प्रयागराज माघ मेले में शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद के साथ हुई घटना ने नया विवाद खड़ा कर दिया। मौनी अमावस्या के दिन उन्होंने संगम स्नान की मांग की। कई दिनों तक अनशन भी किया। लेकिन स्नान नहीं कराया गया। अंत में वे बिना स्नान किए मेला छोड़कर चले गए। यह तस्वीर सामने आते ही संत समाज में नाराज़गी फैल गई। मामला धीरे-धीरे राजनीति तक पहुंच गया।
काशी पहुंचते ही शंकराचार्य का रुख और सख्त क्यों हुआ?
मेला छोड़ने के बाद शंकराचार्य काशी पहुंचे। यहां उन्होंने साफ संकेत दिया कि विवाद अब रुकेगा नहीं। उन्होंने कहा कि संत समाज का अपमान हुआ है। प्रशासन पर भरोसा टूट गया है। यह सिर्फ एक स्नान का मामला नहीं है। उन्होंने इसे सनातन धर्म के सम्मान से जोड़ा। इसके बाद बयान लगातार तीखे होते चले गए।
धर्म संसद के ऐलान से विवाद और क्यों भड़क गया?
शंकराचार्य ने महाशिवरात्रि से पहले लखनऊ में धर्म संसद बुलाने का ऐलान किया। 10 और 11 मार्च की तारीख तय की गई। कहा गया कि देशभर के संत इसमें शामिल होंगे। यहीं तय होगा कि असली हिंदू कौन है। हिंदू हृदय सम्राट किसे कहा जाए। किसे नकली हिंदू माना जाए। इस ऐलान से सियासी हलकों में हलचल तेज हो गई।
गोमांस को लेकर योगी सरकार को 40 दिन का अल्टीमेटम क्यों?
शंकराचार्य ने कहा कि उत्तर प्रदेश से गोमांस का निर्यात हो रहा है। उन्होंने योगी आदित्यनाथ को सीधी चुनौती दी। कहा कि अगर वे वास्तव में हिंदू हैं। तो 40 दिनों में गोमांस का निर्यात बंद करके दिखाएं। यही उनके हिंदू होने का प्रमाण होगा। इसी अल्टीमेटम के आधार पर धर्म संसद रखी गई है। बयान से सरकार पर दबाव बढ़ गया। शंकराचार्य ने कहा कि इतिहास में पहली बार उनसे प्रमाण मांगा गया। उनसे शंकराचार्य होने का प्रमाण पत्र पूछा गया। उन्होंने प्रमाण दिया। अब वही मापदंड योगी आदित्यनाथ पर भी लागू होना चाहिए। उन्होंने कहा कि अगर 40 दिन में गोभक्ति का प्रमाण नहीं दिया गया। तो संत समाज निंदा करेगा। यह बयान विवाद की आग बन गया।
माघ मेला छोड़ने को लेकर प्रशासन पर क्या गंभीर आरोप लगे?
शंकराचार्य ने प्रशासन पर आरोप लगाए। कहा गया कि उन्हें लालच दिया गया। संगम स्नान और फूलों की बारिश का वादा किया गया। अगले साल चारों शंकराचार्यों के लिए प्रोटोकॉल बनाने की बात कही गई। लेकिन उन्होंने मना कर दिया। उन्होंने कहा कि पहले उन बटुकों और संन्यासियों से माफी मांगी जाए। जिन पर लाठीचार्ज हुआ था। इस पूरे मामले पर संत समाज एकजुट नहीं दिखा। कुछ संतों ने शंकराचार्य के बयान पर आपत्ति जताई। कहा गया कि सनातन को राजनीति का हथियार बनाया जा रहा है। योगी से सबूत मांगना गलत बताया गया। सरकार की ओर से भी जवाब आया। मंत्री ओमप्रकाश राजभर ने सवाल उठाया। क्या शंकराचार्य सभी हिंदुओं के ठेकेदार हैं। विवाद अब पूरी तरह राजनीतिक रंग ले चुका

























