सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान माहौल गंभीर रहा। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस पीबी वराले की पीठ ने सरकार से सीधा सवाल किया। अदालत ने पूछा कि क्या बयान का अर्थ जरूरत से ज्यादा निकाला गया। जजों ने कहा कि एक लाइन नहीं, पूरा संदर्भ पढ़ा जाना चाहिए। अदालत ने संकेत दिया कि वांगचुक की बात चिंता जताने वाली भी हो सकती है। हर असहमति को देशविरोध नहीं कहा जा सकता। इस टिप्पणी के बाद अदालत कक्ष में सन्नाटा छा गया।
क्या भाषण का संदर्भ काटा गया?
सरकार की ओर से एडिशनल सॉलिसिटर जनरल केएम नटराज ने दलील रखी। उन्होंने कहा कि भाषण में मिले-जुले संकेत थे। सरकार का तर्क था कि इससे युवाओं को भड़काया जा सकता था। लेकिन अदालत ने कहा कि शब्दों को तोड़कर नहीं देखा जा सकता। जजों ने साफ कहा कि चिंता और उकसावे में फर्क होता है। हिंसा की आशंका बताना हमेशा उकसावा नहीं होता। अदालत ने कहा कि जरूरत से ज्यादा मतलब निकाला जा रहा है। इससे बहस और तेज हो गई।
गांधी का नाम क्यों आया?
सुनवाई के दौरान सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि वांगचुक की तुलना महात्मा गांधी से नहीं की जानी चाहिए। उनका कहना था कि यह बात सुर्खी बन सकती है। उन्होंने कहा कि राष्ट्रपिता के नाम का गलत संदर्भ नहीं होना चाहिए। अदालत ने जवाब दिया कि बात को अलग संदर्भ में पढ़ा गया। जजों ने स्पष्ट किया कि अदालत मीडिया की हेडलाइन से नहीं चलती। यह पल सुनवाई का सबसे चर्चित हिस्सा बन गया।
क्या मीडिया की सुर्खियां मुद्दा बनीं?
सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि मीडिया इस टिप्पणी को अलग ढंग से दिखा सकता है। उन्होंने आशंका जताई कि गलत संदेश जाएगा। अदालत ने दो टूक कहा कि उसे मीडिया से कोई सरोकार नहीं। अदालत का काम कानून देखना है, सुर्खियां नहीं। जजों ने कहा कि सवाल पूछना उनका अधिकार है। यदि सरकार को आपत्ति है तो वह तर्क दे। अदालत का रुख यहां काफी स्पष्ट और सख्त दिखा।
क्या एनएसए लगाना उचित था?
यह मामला राष्ट्रीय सुरक्षा कानून के तहत हिरासत से जुड़ा है। सरकार का कहना है कि लद्दाख सीमावर्ती और संवेदनशील क्षेत्र है। वहां कानून व्यवस्था बिगड़ सकती थी। इसलिए एहतियातन कार्रवाई की गई। दूसरी ओर वांगचुक की पत्नी गीतांजलि अंगमो ने कहा कि यह शांतिपूर्ण विरोध था। उन्होंने कहा कि सरकार की आलोचना लोकतंत्र में अधिकार है। अदालत ने पहले भी हिरासत पर पुनर्विचार की बात कही थी। अब अदालत ने दस्तावेज और वीडियो रिकॉर्ड मांगे हैं।
क्या स्वास्थ्य का मुद्दा भी उठा?
सुनवाई के दौरान वांगचुक की सेहत पर भी चर्चा हुई। पत्नी ने अदालत को बताया कि स्वास्थ्य चिंता का विषय है। सरकार ने कहा कि नियमित मेडिकल जांच हो रही है। स्थिति को सामान्य बताया गया। लेकिन अदालत ने कहा कि हिरासत में व्यक्ति की सुरक्षा राज्य की जिम्मेदारी है। स्वास्थ्य को हल्के में नहीं लिया जा सकता। अदालत ने संबंधित रिकॉर्ड मांगे हैं। इससे मामले को मानवीय पहलू भी मिला।
आगे क्या होगा?
अब सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई तय की है। अदालत ने कहा कि मांगे गए दस्तावेज पेश किए जाएं। यह मामला अब सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं रहा। यह सवाल है कि विरोध की सीमा क्या है। और सरकार की शक्ति की हद कहां तक है। अदालत का फैसला व्यापक असर डाल सकता है। फिलहाल पूरे देश की नजर अगली सुनवाई पर है।























