13वीं सदी के ग्रंथों में ‘गूंझा’ नामक पकवान का उल्लेख मिलता है। इसे गुजिया का प्रारंभिक रूप माना जाता है। फूड हिस्टोरियन के.टी. अचाया ने भरवां और तली पेस्ट्री की परंपरा का वर्णन किया है। इससे संकेत मिलता है कि यह मिठाई सदियों पुरानी है। कुछ इतिहासकार इसे तुर्की की बकलावा से जोड़ते हैं। बकलावा परतदार और मेवों से भरी मिठाई है। व्यापारियों के जरिए यह परंपरा भारत आई। भारतीय रसोइयों ने इसमें मावा और स्थानीय स्वाद जोड़ा। इस तरह गुजिया का वर्तमान रूप बना।
बुंदेलखंड का क्या योगदान रहा?
मध्यकाल में बुंदेलखंड की शाही रसोइयों ने इसे लोकप्रिय बनाया। ‘चंद्रकला’ जैसे रूप भी यहीं विकसित हुए। यहां से यह ब्रज और उत्तर भारत में फैली। ब्रज में इसे भगवान कृष्ण को भोग के रूप में चढ़ाया जाता था। मुगल काल में केसर और महंगे मेवे जोड़े गए। इससे इसका स्वाद और समृद्ध हुआ।
समय के साथ क्या बदलाव आए?
13वीं सदी में यह साधारण मीठा पकवान था। बाद में मावा और मेवों की भराई शुरू हुई। मुगल दौर में शाही रूप मिला। आज चॉकलेट और शुगर-फ्री जैसे नए फ्लेवर भी उपलब्ध हैं। महाराष्ट्र में इसे करंजी कहा जाता है। बिहार में पिड़किया और कर्नाटक में कर्जीकाई। हर क्षेत्र ने इसे अपने स्वाद के अनुसार ढाला। फिर भी गुजिया आज भी होली की शान बनी हुई है।
























