आज के समय में बच्चों की परवरिश पहले की तुलना में कहीं ज्यादा चुनौतीपूर्ण हो गई है। बदलती लाइफस्टाइल, बढ़ता सोशल मीडिया और दोस्तों का बढ़ता दायरा बच्चों के स्वभाव और आदतों पर गहरा असर डालता है। अगर बच्चा गलत दोस्तों की संगत में पड़ जाए तो उसका व्यवहार, पढ़ाई और भविष्य प्रभावित हो सकता है। कई बार माता-पिता को शुरुआत में समझ ही नहीं आता कि उनका बच्चा किन लोगों के साथ समय बिता रहा है। इसलिए बच्चों की संगत पर ध्यान देना और उन्हें सही-गलत की समझ देना बेहद जरूरी हो जाता है।
क्या बच्चों से खुलकर बातचीत जरूरी है?
करीब 12 से 13 साल की उम्र बच्चों के लिए बहुत संवेदनशील मानी जाती है। इस उम्र में बच्चे नई चीजों को जानने और समझने में ज्यादा रुचि लेते हैं। ऐसे में माता-पिता को बच्चों के साथ दोस्ताना रिश्ता बनाना चाहिए। रोज उनसे बातचीत करना जरूरी है। जब बच्चा अपनी परेशानियां, स्कूल की बातें और दोस्तों के बारे में खुलकर बताएगा तो माता-पिता को यह समझने में आसानी होगी कि वह किन लोगों के साथ समय बिता रहा है। इससे समय रहते गलत संगत का पता लगाया जा सकता है।
क्या बच्चों के दोस्तों और परिवार को जानना जरूरी है?
माता-पिता को कोशिश करनी चाहिए कि वे बच्चों के दोस्तों से मिलें और उनके परिवार के बारे में भी जानकारी रखें। इससे यह समझने में मदद मिलती है कि बच्चा किस तरह के माहौल में रहने वाले दोस्तों के साथ समय बिता रहा है। अगर माता-पिता को दोस्तों और उनके परिवार के बारे में जानकारी होगी तो वे यह बेहतर तरीके से समझ पाएंगे कि वह संगत सही है या नहीं। यह बच्चों की परवरिश का एक अहम हिस्सा माना जाता है।
क्या बचपन से सही-गलत की समझ देना जरूरी है?
बच्चों को छोटी उम्र से ही अच्छे संस्कार और सही-गलत की पहचान सिखानी चाहिए। अगर बच्चा समझ जाएगा कि झूठ बोलना, गलत भाषा का इस्तेमाल करना या बुरी आदतें अपनाना गलत है तो वह खुद ऐसी संगत से दूर रहने की कोशिश करेगा। माता-पिता को समय-समय पर बच्चों से उनके दोस्तों और पूरे दिन की गतिविधियों के बारे में पूछना चाहिए। इससे बच्चे का भरोसा भी बना रहता है और माता-पिता को सही जानकारी भी मिलती रहती है।
क्या बच्चों के रूटीन और एक्टिविटी पर नजर रखना जरूरी है?
माता-पिता को यह ध्यान रखना चाहिए कि बच्चा अपना समय कैसे बिता रहा है। वह मोबाइल फोन पर क्या देख रहा है, किन लोगों से मिल रहा है और किस तरह की गतिविधियों में शामिल है। इन सब बातों पर नजर रखना जरूरी है। बच्चों को पढ़ाई के साथ-साथ खेल, हॉबी और क्रिएटिव एक्टिविटी में व्यस्त रखना चाहिए। जब बच्चा सकारात्मक कामों में व्यस्त रहेगा तो उसके गलत संगत में पड़ने की संभावना कम हो जाएगी।
क्या प्यार से समझाना ज्यादा असरदार होता है?
अगर माता-पिता को लगे कि बच्चा गलत दोस्तों की संगत में पड़ रहा है तो उसे डांटने या डराने की बजाय प्यार से समझाना चाहिए। बच्चे को यह बताना जरूरी है कि कौन-सी दोस्ती उसके लिए अच्छी है और कौन-सी नुकसानदायक। सही मार्गदर्शन मिलने पर बच्चे अक्सर खुद ही सही रास्ता चुन लेते हैं। इसलिए माता-पिता को धैर्य और समझदारी के साथ बच्चों को सही दिशा दिखानी चाहिए।

























