आर्थिक सर्वे बताता है कि 15 से 29 साल के युवाओं में मोबाइल और इंटरनेट का इस्तेमाल लगभग सार्वभौमिक हो चुका है।आज इंटरनेट तक पहुंच कोई रुकावट नहीं रही।हर हाथ में स्मार्टफोन है।हर समय स्क्रीन मौजूद है।युवा पढ़ाई के साथ सोशल मीडिया में डूबे हैं।यह आदत धीरे धीरे लत बन रही है।सर्वे इसे गंभीर संकेत मानता है।
पढ़ाई और काम पर इसका असर कितना गहरा है?
रिपोर्ट के मुताबिक डिजिटल ऐप्स पर निर्भरता पढ़ाई को नुकसान पहुंचा रही है।पढ़ने के घंटे घट रहे हैं।ध्यान भटक रहा है।कामकाजी युवाओं की उत्पादकता भी प्रभावित हो रही है।ऑफिस में फोकस कम हो रहा है।लगातार नोटिफिकेशन दिमाग पर दबाव डालते हैं।इसका सीधा असर प्रदर्शन पर पड़ रहा है।
मानसिक स्वास्थ्य के लिए यह कितना खतरनाक है?
सर्वे मानसिक स्वास्थ्य को लेकर भी चेतावनी देता है।डिजिटल लत तनाव बढ़ाती है।नींद में खलल पड़ता है।अकेलापन और चिड़चिड़ापन बढ़ता है।कई मामलों में डिप्रेशन के लक्षण दिखते हैं।किशोर सबसे ज्यादा प्रभावित हो रहे हैं।ऑनलाइन दुनिया असली रिश्तों से दूरी बना रही है।यह चिंता का बड़ा कारण है।
गेमिंग और ऑनलाइन जुए का खतरा क्यों बढ़ा?
सर्वे में गेमिंग की लत पर खास जोर दिया गया है।ऑनलाइन गेमिंग कई बार जुए की आदत में बदल जाती है।इससे नींद खराब होती है।आक्रामक व्यवहार बढ़ता है।सामाजिक अलगाव गहराता है।किशोर इस जोखिम के सबसे करीब हैं।आर्थिक नुकसान तक की नौबत आ सकती है।यह खतरा तेजी से फैल रहा है।
साइबर ठगी और बुलिंग का खतरा कैसे बढ़ता है?
डिजिटल लत सिर्फ समय की बर्बादी नहीं है।यह ऑनलाइन धोखाधड़ी का जोखिम भी बढ़ाती है।युवा साइबर बुलिंग के शिकार हो रहे हैं।फर्जी लिंक और स्कैम आसानी से जाल में फंसा लेते हैं।मानसिक तनाव और बढ़ जाता है।कई बार आर्थिक नुकसान भी होता है।सर्वे इसे गंभीर सामाजिक लागत मानता है।
दुनिया के देश इससे कैसे निपट रहे हैं?
कई देशों ने सख्त कदम उठाए हैं।ऑस्ट्रेलिया ने 16 साल से कम उम्र के बच्चों पर सोशल मीडिया प्रतिबंध लगाया है।चीन और दक्षिण कोरिया ने गेमिंग पर नियंत्रण किया है।यूरोप और अमेरिका में भी नियम सख्त हैं।मकसद बच्चों और युवाओं को सुरक्षित रखना है।डिजिटल अनुशासन को जरूरी माना जा रहा है।
भारत में इसे रोकना इतना मुश्किल क्यों है?
सर्वे कहता है कि भारत में ठोस डेटा की कमी बड़ी चुनौती है।डिजिटल खपत पर पूरी जानकारी नहीं है।इससे लक्षित नीतियां बनाना कठिन होता है।मानसिक स्वास्थ्य रणनीतियों में डिजिटल वेलनेस जोड़ना जरूरी है।आने वाला राष्ट्रीय मानसिक स्वास्थ्य सर्वे मददगार हो सकता है।लेकिन फिलहाल चुनौती बड़ी है।सौरभ द्विवेदी की नजर में यह लत तकनीक नहीं सोच बदलने से रुकेगी।

























