स्टॉल पर मौजूद प्रतिनिधि ने कैमरे के सामने कहा कि रोबो डॉग यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में विकसित किया गया है और यही बयान पूरे विवाद की शुरुआत बना क्योंकि लोगों ने इसे पूरी तरह स्वयं निर्मित उत्पाद मान लिया और यहीं से सवाल उठने लगे। वीडियो सामने आते ही सोशल मीडिया पर यूजर्स ने चीन निर्मित एक मॉडल से इसकी तुलना शुरू कर दी और डिजाइन व संरचना की समानता दिखाते हुए लिंक साझा किए जिससे आरोप लगा कि विदेशी मॉडल को भारतीय नवाचार बताकर प्रस्तुत किया गया है।
क्या डिवेलप और बिल्ड में भ्रम हुआ?
बाद में प्रोफेसर ने स्पष्ट किया कि रोबोट को बिल्ड नहीं बल्कि डिवेलप किया जा रहा है और रिसर्च प्लेटफॉर्म पर काम करना तथा पूरी तरह स्वयं बनाना अलग बातें हैं लेकिन कैमरे पर गया संदेश स्पष्ट न होने से भ्रम गहरा गया। विवाद बढ़ने के बाद यूनिवर्सिटी ने सोशल मीडिया पर बयान जारी कर कहा कि प्रतिनिधि को पूरी तकनीकी जानकारी नहीं थी और उन्हें मीडिया से बात करने की अनुमति भी नहीं थी जिसके कारण गलतफहमी हुई और संस्थान ने समिट से अपना स्टॉल हटा लिया।
क्या ड्रोन सॉकर ने नया मोर्चा खोला?
रोबो डॉग विवाद शांत भी नहीं हुआ था कि ड्रोन सॉकर का वीडियो सामने आया जिसमें दावा किया गया कि इसकी एंड टू एंड इंजीनियरिंग यूनिवर्सिटी में हुई है और कैंपस में भारत का पहला ड्रोन सॉकर एरीना स्थापित है जिससे चर्चा फिर तेज हो गई।
क्या कोरियाई मॉडल से तुलना हुई?
कुछ यूजर्स ने दक्षिण कोरिया की कंपनी हेलसेल के मॉडल से वीडियो में दिखाए गए ड्रोन की तुलना की और फीचर तथा कीमत तक गिनाए जिससे यह आरोप और मजबूत हुआ कि विदेशी तकनीक को भारतीय नवाचार बताकर पेश किया गया है। यह मामला अब केवल एक रोबोट या ड्रोन तक सीमित नहीं रहा बल्कि शैक्षणिक पारदर्शिता और ईमानदारी का मुद्दा बन गया है क्योंकि तकनीक के दौर में हर दावा तुरंत जांच के घेरे में आ जाता है और शब्दों की थोड़ी चूक भी संस्थान की साख को प्रभावित कर सकती है।

























