यह मामला एक 20 वर्षीय वादी से जुड़ा है, जिसे कोर्ट में “केजीएम” नाम से पहचाना गया। उसने आरोप लगाया कि इंस्टाग्राम, टिकटॉक और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म्स की डिजाइन इस तरह बनाई गई है कि यूजर्स ज्यादा समय बिताएं और धीरे-धीरे लत लग जाए। मामले की सुनवाई से पहले टिकटॉक और स्नैप ने समझौता कर लिया, जबकि मेटा और यूट्यूब ने अदालत में अपना पक्ष रखा।
जूरी ने क्या फैसला सुनाया?
जूरी ने अपने फैसले में कहा कि इन प्लेटफॉर्म्स की संरचना बच्चों के लिए हानिकारक हो सकती है। कुल मुआवजे में से 70 प्रतिशत राशि मेटा को और बाकी हिस्सा यूट्यूब को देना होगा। इसके अलावा वादी को 3 मिलियन डॉलर दंडात्मक क्षति के रूप में भी देने का आदेश दिया गया है।
कंपनियों की क्या प्रतिक्रिया रही?
फैसले के बाद मेटा ने कहा कि वह इस निर्णय से सहमत नहीं है और आगे कानूनी विकल्पों पर विचार कर रही है। वहीं गूगल ने यूट्यूब का बचाव करते हुए कहा कि यह एक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म है, पारंपरिक सोशल मीडिया नहीं। कंपनी ने इस फैसले के खिलाफ अपील करने की बात कही है।
लत कैसे लगती है?
वादी के मुताबिक उसने 8-9 साल की उम्र में सोशल मीडिया का इस्तेमाल शुरू कर दिया था। धीरे-धीरे वह अपना ज्यादा समय खासतौर पर इंस्टाग्राम पर बिताने लगी। वकीलों का कहना है कि “अनंत स्क्रॉल” जैसे फीचर्स जानबूझकर इस तरह बनाए गए हैं, जिससे यूजर लंबे समय तक प्लेटफॉर्म पर बना रहे।
क्यों अहम है यह फैसला?
यह फैसला इसलिए खास माना जा रहा है क्योंकि इसमें पहली बार सोशल मीडिया की डिजाइन को सीधे नुकसान का कारण माना गया है। इससे टेक कंपनियों पर कानूनी दबाव बढ़ सकता है और भविष्य में नए नियम लागू हो सकते हैं।
आगे क्या असर पड़ेगा?
इस फैसले के बाद दुनिया भर में टेक कंपनियों की नीतियों पर सवाल उठ सकते हैं। बच्चों की सुरक्षा को लेकर सख्त कानून बनाए जा सकते हैं। अब देखना होगा कि यह मामला आगे किस दिशा में जाता है, लेकिन इतना तय है कि सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यह एक बड़ा चेतावनी संकेत बन चुका है।

























