बीएनपी सांसदों ने संसद सदस्य की सामान्य शपथ ली। लेकिन जुलाई चार्टर के तहत संविधान सुधार परिषद की शपथ से इनकार कर दिया। यही टकराव की मुख्य वजह बनी। जमात और एनसीपी ने इसे गंभीर मुद्दा बताया। उनका कहना है कि चार्टर का सम्मान जरूरी है। इसी कारण कैबिनेट शपथ समारोह का बहिष्कार किया गया।
क्या है जुलाई चार्टर का महत्व?
जुलाई चार्टर को 17 अक्टूबर 2025 को अपनाया गया था। इसका मकसद संसद को 180 दिनों के लिए संविधान सभा में बदलना है। इससे बड़े संवैधानिक सुधार संभव होते हैं। हालिया जनमत संग्रह में इसे 62 प्रतिशत समर्थन मिला। बीएनपी ने पहले हस्ताक्षर किए थे। अब वह अंतिम दस्तावेज पर सवाल उठा रही है।
क्या बीएनपी को नहीं मिली सलाह का मौका?
बीएनपी का दावा है कि चार्टर तैयार करते समय उससे पूरी सलाह नहीं ली गई। पार्टी का कहना है कि दस्तावेज के अंतिम संस्करण में नई शर्तें जोड़ी गईं। जिन पर उसकी सहमति नहीं थी। पहले बीएनपी सिर्फ चुनाव कराने के पक्ष में थी। जबकि जमात और एनसीपी सुधारों पर जोर दे रहे थे।
क्या जमात ने बीएनपी को बताया फासीवादी?
जमात महासचिव मिया गोलाम परवार ने बीएनपी पर तीखा हमला किया। उन्होंने उसे फासीवादी ताकत बताया। चुनावी गड़बड़ी और हिंसा के आरोप लगाए। नोआखाली में कथित घटना का भी जिक्र किया। गठबंधन ने साफ कहा कि वे सड़क पर उतरेंगे।
क्या नया आंदोलन शुरू हो सकता है?
एनसीपी नेता नासिरुद्दीन पटवारी ने लोगों से उम्मीद न छोड़ने की अपील की। उन्होंने तारिक रहमान को जवाबदेह ठहराने की बात कही। 2024 के आंदोलनों की यादें अभी ताजा हैं। ऐसे में नया टकराव बड़ा रूप ले सकता है। अगर विरोध तेज हुआ तो स्थिरता प्रभावित होगी।
क्या सरकार के लिए चुनौती बढ़ेगी?
बीएनपी ने 12 फरवरी के चुनाव में 212 सीटें जीतकर सरकार बनाई। लेकिन सत्ता संभालते ही सहयोगियों से टकराव शुरू हो गया। यह हालात नए राजनीतिक संकट का संकेत हैं। अगर बातचीत से समाधान नहीं निकला तो हालात बिगड़ सकते हैं। आने वाले दिन अहम साबित होंगे।
























