ग्रीनलैंड को लेकर अमेरिका के बयानों के बीच डेनमार्क ने साफ कर दिया है कि किसी भी हमले की स्थिति में उसकी सेना आदेश का इंतजार नहीं करेगी।
ग्रीनलैंड पर अचानक तनाव क्यों बढ़ा?
ग्रीनलैंड रणनीतिक रूप से अहम है।आर्कटिक क्षेत्र में गतिविधियां बढ़ी हैं।अमेरिका की दिलचस्पी खुलकर सामने आई है।डेनमार्क सतर्क हो गया है।सुरक्षा को हल्के में नहीं लिया जा रहा।बयानबाजी ने माहौल गरम किया है।आर्कटिक में बर्फ पिघलने से नए समुद्री रास्ते खुले हैं।प्राकृतिक संसाधनों की संभावना बढ़ी है।महाशक्तियों की नजर इस इलाके पर टिक गई है।सैन्य मौजूदगी पर चर्चा तेज हुई है।राजनीतिक बयान ज्यादा सख्त हो गए हैं।इसी वजह से तनाव अचानक बढ़ता दिख रहा है।
सेना को खुली छूट क्यों दी गई?
डेनमार्क ने साफ किया है कि हमले की स्थिति में तुरंत जवाब दिया जाएगा।ऊपर से आदेश का इंतजार नहीं होगा।मकसद अचानक हमले से बचाव है।देरी को खतरा माना जा रहा है।तेज फैसले को जरूरी समझा गया है।मैदान में मौजूद सैनिकों को अधिकार दिए गए हैं।पुराने अनुभव बताते हैं कि देर भारी पड़ती है।इसी डर से नियम सख्त किए गए हैं।सुरक्षा को प्राथमिकता दी जा रही है।राजनीतिक मंजूरी की प्रक्रिया हटाई गई है।
यह नीति नई क्यों नहीं है?
यह नियम दशकों पुराना है।ठंडी जंग के समय इसे अपनाया गया था।दूसरे विश्व युद्ध के अनुभव से सबक लिया गया था।उसी सोच को अब दोहराया गया है।तब भी अचानक हमले का खतरा था।डेनमार्क को नुकसान उठाना पड़ा था।इतिहास से सीखा गया सबक आज भी लागू माना जाता है।नीति को समय-समय पर दोहराया गया है।सुरक्षा ढांचे में इसे जरूरी माना गया।इसी वजह से इसे नई नीति नहीं कहा जा सकता।
ग्रीनलैंड की सुरक्षा किसके हाथ में है?
ग्रीनलैंड का प्रशासन स्थानीय है।लेकिन रक्षा की जिम्मेदारी डेनमार्क के पास है।आर्कटिक कमांड हालात का मूल्यांकन करती है।अंतिम फैसला कोपेनहेगन का होता है।सैन्य तैनाती वहीं से नियंत्रित होती है।आपात स्थिति में सेना कार्रवाई करती है।स्थानीय सरकार सुरक्षा फैसले नहीं लेती।रक्षा नीति पूरी तरह डेनमार्क के अधीन है।इसी वजह से बयान भी वहीं से आते हैं।सुरक्षा व्यवस्था केंद्रीकृत है।
अमेरिका की चिंता क्या है?
अमेरिका को आर्कटिक क्षेत्र में रूस और चीन की मौजूदगी की चिंता है।ग्रीनलैंड को रणनीतिक सुरक्षा बिंदु माना जा रहा है।इसी कारण बयान तेज हुए हैं।अमेरिका वहां सैन्य संतुलन चाहता है।नए ठिकानों की जरूरत महसूस की जा रही है।निगरानी बढ़ाने पर जोर है।आर्कटिक भविष्य की सुरक्षा से जुड़ा माना जा रहा है।तकनीकी और सैन्य नजरिए से महत्व बढ़ा है।इसी वजह से चिंता खुलकर सामने आई है।
डेनमार्क और ग्रीनलैंड का साफ संदेश
दोनों ने साफ कहा है कि जमीन बिक्री के लिए नहीं है।किसी भी सैन्य दबाव को स्वीकार नहीं किया जाएगा।संप्रभुता पर कोई समझौता नहीं होगा।ग्रीनलैंड की स्थिति स्पष्ट रखी गई है।डेनमार्क पूरी तरह समर्थन में खड़ा है।राजनीतिक बयान एकजुटता दिखाते हैं।नाटो के भीतर टकराव खतरा बन सकता है।एक देश का दूसरे पर दबाव गलत माना जा रहा है।संदेश सीधा और सख्त है।
क्या बातचीत से रास्ता निकलेगा?
कूटनीतिक बातचीत जारी है।उम्मीद है कि समाधान बातचीत से निकले।अधिकारी संपर्क में बने हुए हैं।तनाव कम करने की कोशिश हो रही है।डेनमार्क संतुलन बनाए रखना चाहता है।संघर्ष से बचाव प्राथमिकता है।लेकिन सुरक्षा से समझौता नहीं होगा।यह बात साफ कर दी गई है।अगर दबाव बढ़ा तो रुख सख्त रहेगा।अभी नजरें बातचीत के नतीजे पर टिकी हैं।

























