इंटरनेशनल न्यूज. अमेरिकी सीनेट में ट्रंप प्रशासन की टैरिफ नीति के खिलाफ 51-47 मतों से प्रस्ताव पारित हुआ। यह तीसरी बार है जब उनकी व्यापार नीति को अपनी ही पार्टी के नेताओं का विरोध झेलना पड़ा। अलास्का की लीसा मुर्कोस्की, मैन की सुजैन कॉलिन्स, केंटकी के रैंड पॉल और मिच मैकॉनल ने विपक्ष का साथ दिया। यह कदम बताता है कि ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति अब पार्टी के भीतर भी सवालों के घेरे में है।
क्या ट्रंप का ‘टैरिफ हथियार’ असरदार है?
ट्रंप ने दावा किया कि उनकी टैरिफ नीति ने कई देशों को युद्ध से रोका है। उन्होंने कहा था कि भारत और पाकिस्तान के बीच बढ़ते तनाव को उन्होंने शुल्क धमकी से खत्म कराया। उन्होंने चेतावनी दी थी कि अगर दोनों देशों ने युद्ध जारी रखा तो अमेरिका 200% शुल्क लगा देगा। ट्रंप का दावा था कि इस दबाव ने दोनों को पीछे हटने पर मजबूर किया, लेकिन इस बयान ने कूटनीतिक हलकों में हलचल मचा दी।
क्या विशेषज्ञ मानते हैं ये सच?
अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और मीडिया ने ट्रंप के दावे पर संदेह जताया। उनका कहना है कि भारत-पाक तनाव में कमी का कारण अमेरिकी टैरिफ नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय दबाव और वार्ता थी। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप यह सब घरेलू राजनीति में सख्त छवि दिखाने के लिए कर रहे हैं। उनका कहना है कि आर्थिक धमकियों से कूटनीतिक रिश्ते नहीं सुधरते, बल्कि और उलझते हैं।
क्या पार्टी में दरार गहरी हो रही है?
रिपब्लिकन पार्टी के भीतर असहमति अब खुलकर सामने आ रही है। कई सांसदों का कहना है कि ट्रंप की संरक्षणवादी नीति अमेरिकी उपभोक्ताओं पर भारी पड़ रही है। आयात पर बढ़े शुल्क से महंगाई बढ़ रही है और निर्यात घट रहा है। रैंड पॉल ने कहा कि “टैरिफ असल में टैक्स ही है, जिसका बोझ जनता पर पड़ता है।” यह बयान पार्टी के भीतर बढ़ती बेचैनी का संकेत है।
क्या ट्रंप का झुकाव संभव है?
सीनेट में पारित प्रस्ताव का ट्रंप की नीति पर फिलहाल कोई सीधा असर नहीं होगा क्योंकि इसे प्रतिनिधि सभा से भी मंजूरी लेनी होगी। रिपब्लिकन नेतृत्व फिलहाल इसे आगे नहीं बढ़ाना चाहता। लेकिन यह मत विभाजन ट्रंप के लिए राजनीतिक चेतावनी है कि हर बार पार्टी उनकी नीतियों के साथ नहीं खड़ी रहेगी। यह स्थिति चुनावी साल में उनके लिए मुश्किलें बढ़ा सकती है।
क्या व्हाइट हाउस पीछे हटेगा?
व्हाइट हाउस ने इस मतदान को ‘राजनीतिक ड्रामा’ बताया है। बयान में कहा गया कि राष्ट्रपति अमेरिकी हितों की रक्षा के लिए हर आर्थिक कदम उठाएंगे, चाहे कोई भी विरोध करे। ट्रंप प्रशासन का कहना है कि टैरिफ नीति से अमेरिका का व्यापार घाटा घटा है और घरेलू उद्योग को राहत मिली है। लेकिन अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह राहत अस्थायी है और इससे विदेशी निवेशक डर रहे हैं।
क्या ट्रंप का शो वाकई फुस्स हुआ?
अब सवाल यह है कि ट्रंप की ‘टैरिफ डिप्लोमेसी’ काम कर रही है या नहीं। सीनेट का विरोध और विशेषज्ञों की आलोचना बताती है कि यह रणनीति ज्यादा समय नहीं चलेगी। ट्रंप ने इसे ‘शांति का हथियार’ कहा था, लेकिन अब यही हथियार उनके लिए राजनीतिक जंग का कारण बन गया है। अपने ही देश में विरोध का सामना कर रहे ट्रंप के लिए ये संकेत अच्छे नहीं हैं।

























