अमेरिकी राष्ट्रपति ने दावा किया कि भारत रूस से तेल नहीं खरीदेगा। बयान ऐसे समय आया जब भारत सरकार की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई। न समर्थन सामने आया। न खंडन किया गया। यही चुप्पी इस दावे पर सवाल खड़े कर रही है। भारत के फैसले सार्वजनिक दबाव से तय नहीं होते। विदेश नीति किसी एक देश के बयान पर नहीं बदलती। यही वजह है कि यह दावा फिलहाल एकतरफा नजर आ रहा है।
क्या भारत की विदेश नीति बाहरी दबाव में चलती है
भारत की विदेश नीति लंबे समय से रणनीतिक संतुलन पर आधारित रही है। यहां फैसले संस्थागत सलाह और राष्ट्रीय जरूरतों को देखकर लिए जाते हैं। रूस से तेल खरीदना आर्थिक और ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा मामला है। इसे राजनीतिक बयानबाज़ी से जोड़ना वास्तविकता को नजरअंदाज करने जैसा है। भारत अपनी नीतियां खुद तय करता है। यह परंपरा वर्षों से कायम है।
क्या पहले भी ऐसे दावे किए जा चुके हैं
यह पहली बार नहीं है जब अमेरिकी नेतृत्व ने भारत को लेकर बड़े दावे किए हों। अतीत में भी ऐसे बयान सामने आए हैं, जिन पर भारत ने प्रतिक्रिया देने से बचा है। समय के साथ वे दावे खुद कमजोर पड़ते गए। भारत की नीति रही है कि हर बयान का जवाब तुरंत देना जरूरी नहीं। कई बार चुप्पी ही स्थिति को स्पष्ट कर देती है।
क्या टैरिफ और दबाव से भारत झुका था
पहले भी भारत पर आर्थिक दबाव बनाने की कोशिशें हुईं। टैरिफ लगाए गए। सख्त भाषा का इस्तेमाल हुआ। लेकिन भारत ने न तो जल्दबाज़ी दिखाई और न ही अपनी नीति बदली। उल्टा भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को और मजबूत किया। इससे यह साफ हुआ कि भारत दबाव में फैसले लेने वाला देश नहीं है।
क्या रूस भारत की मजबूरी है या साझेदारी
रूस के साथ भारत के संबंध मजबूरी नहीं बल्कि रणनीतिक साझेदारी पर आधारित हैं। रक्षा और ऊर्जा जैसे अहम क्षेत्रों में दशकों का सहयोग रहा है। जब वैश्विक हालात बदले, तब भी भारत ने अपने हितों को प्राथमिकता दी। सस्ता और स्थिर ऊर्जा स्रोत भारत की जरूरत है। यह निर्णय किसी एक देश की इच्छा पर निर्भर नहीं करता।
क्या अमेरिका को भारत की अहमियत नहीं दिखती
अमेरिका और भारत के रिश्ते बहुआयामी हैं। व्यापार। रणनीति। क्षेत्रीय संतुलन। इन सभी में भारत की भूमिका अहम है। ऐसे में भारत को निर्देश देने जैसी भाषा रिश्तों में असहजता पैदा करती है। अमेरिका भी यह जानता है कि भारत को नजरअंदाज करना उसके हित में नहीं है। यही कारण है कि बयान तो आते हैं, लेकिन ठोस कदमों में सतर्कता रहती है।
क्या निगरानी और कार्रवाई की भाषा सिर्फ संकेत है
अमेरिकी बयान में निगरानी और संभावित कार्रवाई की बात भी कही गई है। लेकिन यह साफ नहीं किया गया कि किस आधार पर और किस नियम के तहत। ऐसे संकेत अक्सर दबाव बनाने के लिए दिए जाते हैं। भारत इससे पहले भी ऐसी भाषा सुन चुका है। और हर बार उसने अपने हितों को प्राथमिकता दी है।
क्या भारत की चुप्पी कमजोरी मानी जाए
भारत की चुप्पी को कमजोरी मानना गलत होगा। यह एक सोची-समझी रणनीति है। भारत जानता है कि हर प्रतिक्रिया सार्वजनिक मंच पर देना जरूरी नहीं। कई बार शांत रहकर स्थिति को संभालना ज्यादा असरदार होता है। यही तरीका अब भी अपनाया जा रहा है।
क्या सरकार नीति बदलने वाली है
अब तक के संकेत यही बताते हैं कि भारत अपनी ऊर्जा नीति में किसी बाहरी दबाव के कारण बदलाव नहीं करेगा। रूस से तेल खरीदने का फैसला भारत की जरूरतों से जुड़ा है। यह फैसला दिल्ली में होगा। किसी और राजधानी में नहीं। भारत साझेदारी में विश्वास करता है। निर्देशों में नहीं।
क्या यह बदले हुए भारत की पहचान है
आज का भारत पहले जैसा नहीं है। वह वैश्विक मंच पर आत्मविश्वास के साथ खड़ा है। अपने हितों को स्पष्ट रूप से समझता है। और जरूरत पड़ने पर चुप रहकर भी मजबूत संदेश देता है। यही वजह है कि ऐसे बयान आते हैं। लेकिन भारत अपने रास्ते पर चलता रहता है।























