मध्य पूर्व में अमेरिकी सैन्य गतिविधियां तेजी से बढ़ी हैं।पेंटागन अब लंबे टकराव की तैयारी करता दिख रहा है।क्षेत्र में हजारों सैनिक और कई जंगी जहाज तैनात हैं।हवाई रक्षा प्रणालियों को भी मजबूत किया जा रहा है।इससे साफ संकेत मिलता है कि अमेरिका कई हालात के लिए तैयार रहना चाहता है।रणनीति में हमला और बचाव दोनों पहलू शामिल बताए जा रहे हैं।अधिकारियों को आशंका है कि हालात जल्दी सामान्य नहीं होंगे।
ईरान पर हमला आसान फैसला क्यों नहीं?
ईरान पर हमला करना अमेरिका के लिए आसान कदम नहीं माना जाता।पिछले अनुभव बताते हैं कि ऐसा संघर्ष लंबा खिंच सकता है।अफगानिस्तान जैसे लंबे युद्ध की आशंका बार-बार सामने आती है।विशेषज्ञ कहते हैं कि जंग अचानक बड़ा मोड़ ले सकती है।ईरान की प्रतिक्रिया संघर्ष का दायरा बढ़ा सकती है।परमाणु ठिकानों पर हमले की चर्चाएं भी तनाव बढ़ाती हैं।इसी वजह से अमेरिका में फैसला लेने की प्रक्रिया जटिल बनी हुई है।
क्या अमेरिकी सैन्य अड्डे बड़े निशाने बन सकते हैं?
मध्य पूर्व में अमेरिका के कई सैन्य अड्डे मौजूद हैं।इन अड्डों पर हजारों सैनिक रहते हैं और इन्हें संभावित निशाना माना जा रहा है।विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान जवाबी कार्रवाई से युद्ध की लागत बढ़ाना चाहेगा।इसी कारण बेस सुरक्षा बढ़ाने पर जोर है।अतिरिक्त एयर डिफेंस सिस्टम तैनात किए जा रहे हैं।सैनिकों की आवाजाही और सुरक्षा व्यवस्था में बदलाव भी हो रहा है।फिर भी खतरा पूरी तरह खत्म नहीं माना जा रहा।
पेंटागन किस जवाबी खतरे से चिंतित है?
अमेरिकी अधिकारी ईरान की प्रतिक्रिया को लेकर सतर्क हैं।आशंका है कि इस बार जवाबी हमला अलग तरीके से हो सकता है।सबसे बड़ा डर अचानक होने वाले हमले का बताया जा रहा है।ऐसा हमला हालात को तेजी से बिगाड़ सकता है।पेंटागन लगातार जोखिम का आकलन कर रहा है।संभावित लक्ष्यों की सूची और सुरक्षा योजना तैयार की जा रही है।बदले के विकल्पों पर भी काम चल रहा है।फिर भी अनिश्चितता बनी हुई है।
विमानवाहक दूरी पर रखने की रणनीति क्या है?
अमेरिकी नौसेना के विमानवाहक इस क्षेत्र में मौजूद हैं।लेकिन उन्हें ईरान से कुछ दूरी पर रखा जा रहा है।उद्देश्य यह है कि संभावित मिसाइल हमले से बचाव हो सके।विमानवाहक को बहुत कीमती सैन्य संपत्ति माना जाता है।इसलिए उनकी सुरक्षा सबसे बड़ी प्राथमिकता रहती है।उनके साथ सुरक्षा के लिए अन्य युद्धपोत भी तैनात किए जाते हैं।रणनीति में लचीलापन रखा गया है।हालात बदलेंगे तो तैनाती भी बदली जा सकती है।
क्या अमेरिका के अस्पष्ट लक्ष्य तनाव बढ़ा रहे हैं?
विशेषज्ञों का मानना है कि साफ लक्ष्य न होने से खतरा बढ़ता है।इससे ईरान इसे अस्तित्व का खतरा मान सकता है।ऐसी स्थिति में उसकी प्रतिक्रिया ज्यादा आक्रामक हो सकती है।रणनीतिक अस्पष्टता तनाव को ऊपर ले जाती है।संचार की कमी भी चिंता का कारण बनती है।अगर उद्देश्य साफ नहीं होगा तो गलत अनुमान का खतरा बढ़ता है।क्षेत्रीय सहयोगी भी उलझन में आ सकते हैं।इसी वजह से नीति को लेकर सवाल खड़े हो रहे हैं।
क्या समझौता सबसे सुरक्षित रास्ता है?
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि कूटनीति बेहतर विकल्प है।जंग दोनों पक्षों के लिए बहुत महंगी साबित हो सकती है।टकराव बढ़ा तो क्षेत्रीय स्थिरता पर असर पड़ेगा।आर्थिक और राजनीतिक झटके भी सामने आ सकते हैं।इसी कारण बातचीत का रास्ता खुला रखने की कोशिश है।समझौता तनाव घटा सकता है और टकराव टाल सकता है।लेकिन भरोसे की कमी बड़ी चुनौती बनी हुई है।आगे की दिशा बातचीत पर ही निर्भर करेगी।

























