रूस ने साफ कर दिया है कि यह सिर्फ सामान्य रक्षा सौदा नहीं होगा। प्रस्ताव में Su-57E फाइटर जेट का पूरा टेक्नोलॉजी ट्रांसफर शामिल है। यहां तक कि अत्यंत सुरक्षित सोर्स कोड तक पहुंच देने की बात कही गई है। इसका मतलब यह होगा कि भारत को किसी विदेशी अनुमति पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। भारतीय इंजीनियर सिस्टम में अपने स्तर पर बदलाव कर सकेंगे। वैश्विक रक्षा सौदों में ऐसा प्रस्ताव बेहद दुर्लभ माना जाता है। मास्को इसे बिक्री नहीं, साझेदारी बता रहा है।
भारत को इसकी जरूरत अभी क्यों है?
भारतीय वायुसेना गंभीर फाइटर स्क्वाड्रन की कमी से जूझ रही है। पुराने MiG-21 पहले ही रिटायर हो चुके हैं। स्वदेशी पांचवीं पीढ़ी की परियोजनाओं को अभी समय लगेगा। रूस Su-57E को तुरंत समाधान के तौर पर पेश कर रहा है। उसका दावा है कि यह जेट भारत की मौजूदा ऑपरेशनल जरूरतों को पूरा करता है। रूस इंतजार के बजाय तेजी का तर्क दे रहा है। फ्लीट रिप्लेसमेंट की तात्कालिक जरूरत इस प्रस्ताव को मजबूत बनाती है।
आज का Su-57 पहले से कितना अलग है?
रूस का कहना है कि आज उड़ रहा Su-57 अपने शुरुआती संस्करण से काफी आगे बढ़ चुका है। इसके हथियार सिस्टम में विस्तार और सुधार किया गया है। एवियोनिक्स को ओपन आर्किटेक्चर की ओर ले जाया गया है। नया इंजन, जिसे Product 177 कहा जा रहा है, फ्लाइट टेस्टिंग में है। यह इंजन ज्यादा थ्रस्ट और बेहतर सुपरक्रूज क्षमता देने का दावा करता है। निर्माता के अनुसार स्टेल्थ प्रदर्शन में भी सुधार हुआ है।
क्या भारत को सच में सोर्स कोड मिलेगा?
United Aircraft Corporation ने दोहराया है कि सोर्स कोड साझा किया जा सकता है। इससे भारत अपने हथियार और सॉफ्टवेयर खुद इंटीग्रेट कर सकेगा। स्थानीय अपग्रेड बिना किसी विदेशी मंजूरी के किए जा सकेंगे। युद्धकाल में यह स्वतंत्रता बेहद अहम मानी जाती है। रूस कहता है कि यह भारत की रणनीतिक संस्कृति से मेल खाता है। यह ‘मेक इन इंडिया’ रक्षा दृष्टि के भी अनुकूल है। ऐसे प्रस्ताव बहुत कम देशों को मिले हैं।
भारत पहले इस प्रोग्राम से बाहर क्यों हुआ था?
भारत ने 2018 में इस कार्यक्रम से दूरी बनाई थी। उस समय तकनीकी जोखिम और बढ़ती जटिलता प्रमुख कारण थे। रूस का दावा है कि अब वे समस्याएं सुलझ चुकी हैं। जेट को अब परिपक्व और कॉम्बैट-टेस्टेड बताया जा रहा है। रूसी वायुसेना के लिए इसका उत्पादन जारी है। मास्को के अनुसार निर्यात समझौते भी हो चुके हैं। रूस का तर्क है कि जोखिम का चरण अब पीछे छूट गया है।
क्या यह लंबी अवधि का प्लेटफॉर्म बन सकता है?
रूस का कहना है कि Su-57 प्लेटफॉर्म 40 से 50 साल की सेवा के लिए डिजाइन किया गया है। इसमें उच्च पेलोड क्षमता और आंतरिक हथियार बे शामिल हैं। इससे भविष्य के हथियार बिना बड़े बदलाव के जोड़े जा सकते हैं। ओपन एवियोनिक्स लगातार अपग्रेड को संभव बनाते हैं। मास्को इसे स्थिर उत्पाद नहीं, बल्कि विकसित होता प्लेटफॉर्म बता रहा है। भारत दशकों तक इसके विकास की दिशा तय कर सकता है।
क्या रूस के अलावा कोई और विकल्प है?
रूस खुलकर कह रहा है कि इस स्तर का ऑफर वह अकेला दे रहा है। देश सोर्स कोड और गहरे बदलाव पर सख्त पाबंदियां लगाते हैं। मास्को भारत के साथ पुराने संयुक्त उत्पादन अनुभव को सामने रख रहा है। भरोसा और इतिहास को इसकी नींव बताया जा रहा है। प्रस्ताव को खरीदार-विक्रेता नहीं, बराबरी की साझेदारी के रूप में पेश किया गया है। अब फैसला भारतीय नीति-निर्माताओं के हाथ में है। यह निर्णय भारत की वायु शक्ति की दिशा तय कर सकता है।
























