अमेरिका खुद को दुनिया का रक्षक बताता रहा है। बड़े मंचों पर शांति और स्थिरता की बातें की गईं। लेकिन बीते एक साल के आंकड़े कुछ और कहते हैं। इस दौरान विदेशी धरती पर 622 बम गिराए गए। यह संख्या किसी भी तरह छोटी नहीं है। जहां बम गिरते हैं वहां भरोसा नहीं बचता। आम लोग इसे अच्छी तरह समझते हैं। बम किसी नीति को नहीं देखते। वे सिर्फ जमीन और इंसानों को नुकसान पहुंचाते हैं। इसलिए शांति के दावे जमीन पर कमजोर पड़ते दिखते हैं।
कितने देशों ने सीधे हमले झेले?
एक ही साल में सात देश अमेरिकी सैन्य कार्रवाई की जद में आए। हर देश में वजह अलग बताई गई। कहीं सुरक्षा का तर्क दिया गया। कहीं आतंकवाद का नाम लिया गया। लेकिन नतीजा हर जगह लगभग एक जैसा रहा। आम लोगों की जिंदगी बिगड़ी। घर टूटे। रोजमर्रा का जीवन ठहर गया। इन कार्रवाइयों ने यह सवाल खड़ा किया कि क्या इतनी ताकत का इस्तेमाल शांति के लिए जरूरी था।
वेनेजुएला निशाने पर क्यों आया?
वेनेजुएला लंबे समय से अमेरिकी दबाव में रहा है। तेल और सत्ता यहां बड़ा मुद्दा है। पिछले साल समुद्री टैंकरों से जुड़ी घटनाओं के बाद हालात और बिगड़े। नए साल की शुरुआत में राजधानी कराकास पर भारी हमले हुए। एयरपोर्ट और बंदरगाह प्रभावित हुए। सरकारी ढांचे को नुकसान पहुंचा। इन घटनाओं से देश की राजनीति हिल गई। आम लोगों के लिए डर और अनिश्चितता रोज का सच बन गई।
सीरिया में किस नाम पर बम गिरे?
सीरिया में अमेरिकी सैनिकों की मौत के बाद हालात तेजी से बदले। आरोप ISIS पर लगाए गए। इसके बाद हवाई हमले तेज कर दिए गए। कहा गया कि आतंकी ठिकाने खत्म किए जा रहे हैं। लेकिन बम शहरों के पास गिरे। आम लोग दहशत में आ गए। बच्चों और महिलाओं पर इसका सबसे गहरा असर पड़ा। कई इलाकों में स्कूल और अस्पताल प्रभावित हुए। जमीन पर मौजूद लोगों के लिए यह सिर्फ एक और युद्ध था।
ईरान से टकराव कितना खतरनाक था?
ईरान के साथ तनाव ने पूरे क्षेत्र को चिंता में डाल दिया। परमाणु ठिकानों पर हमले किए गए। जवाबी कार्रवाई का डर लगातार बना रहा। कुछ दिन बाद सीजफायर हुआ। लेकिन तब तक सैकड़ों लोग जान गंवा चुके थे। शहरों में सन्नाटा और मातम था। बाजार बंद रहे। यह सब उस दौर में हुआ जब शांति की बातें सबसे ज्यादा की जा रही थीं। लोगों के मन में भरोसा टूट गया।
सोमालिया यमन इराक कब चैन पाएंगे?
सोमालिया में सालों से ड्रोन हमले जारी हैं। कहा जाता है कि आतंकी संगठन निशाने पर हैं। यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ लगातार बमबारी हुई। इराक में भी ISIL के नाम पर हमले किए गए। लेकिन इन तीनों देशों में आम लोगों की हालत बद से बदतर हो गई। भूख बढ़ी। इलाज मुश्किल हुआ। बच्चों का भविष्य अंधेरे में चला गया। शांति यहां दूर की बात लगने लगी।
असल सच्चाई क्या ताकत की राजनीति है?
इन सभी घटनाओं को जोड़कर देखें तो तस्वीर साफ दिखती है। शांति की भाषा अलग है। जमीन की सच्चाई अलग है। बमों से स्थिरता नहीं आती। डर से भरोसा नहीं बनता। मौजूदा राष्ट्रपति Donald Trump के दौर में यह नीति बार-बार सवालों के घेरे में आई। दुनिया अब पूछ रही है कि क्या रास्ता बदलेगा। या फिर ताकत की यही राजनीति आगे भी चलती रहेगी। आम इंसान आज भी सिर्फ सच्ची शांति चाहता है।

























