1984 सिख कत्लेआम से जुड़े मामले में सज्जण कुमार की बरी पर पंजाब विधानसभा स्पीकर कुलतार सिंह संधवां ने इसे इंसाफ़ से धोखा करार दिया।
क्या अदालत के फैसले ने जख्म हरे किए?
दिल्ली की राउस एवेन्यू अदालत द्वारा सज्जण कुमार को बरी करने से 1984 के पुराने जख्म एक बार फिर हरे हो गए हैं। यह मामला जनकपुरी और विकासपुरी इलाकों की हिंसा से जुड़ा था। पीड़ित परिवारों के लिए यह फैसला बड़ा झटका बना। लोग कह रहे हैं कि चालीस साल बाद भी इंसाफ़ अधूरा है। अदालतों से उम्मीदें थीं। लेकिन नतीजा निराशाजनक रहा। सिख समुदाय में गुस्सा है। भरोसा डोल रहा है।
कांग्रेस और भाजपा क्यों घेरे गए?
संधवां ने कांग्रेस और भाजपा दोनों को एक ही तराजू में तौलते हुए उनकी भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के शासन दौर में 1984 जैसा बड़ा कत्लेआम हुआ और उस समय सत्ता में बैठे लोग मूक दर्शक बने रहे। भाजपा के दौर में लोगों को उम्मीद थी कि इंसाफ़ मिलेगा और दोषियों को सजा होगी। लेकिन सालों बीत जाने के बावजूद भी न्याय की प्रक्रिया अधूरी नजर आ रही है। इसी वजह से अब लोग दोनों पार्टियों की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। जांच एजेंसियों की निष्पक्षता पर भी शक हो रहा है और लोग पूछ रहे हैं कि असल गुनहगार आखिरकार क्यों बचते रहे।
1984 का दर्द आज भी क्यों जिंदा है?
1984 के जख्म सिर्फ कागजों में दर्ज इतिहास नहीं हैं, बल्कि वे आज भी हजारों परिवारों के दिलों में ताज़ा हैं। उस दौर में घर जलाए गए, बेगुनाह लोगों की जान ली गई और पूरे-पूरे परिवार उजाड़ दिए गए। जिन बच्चों ने अपने मां-बाप खोए, वे आज भी उस पीड़ा के साथ जी रहे हैं। हर बार जब अदालत की तरफ से कोई फैसला आता है, तो पीड़ितों का दर्द और गहरा हो जाता है। इंसाफ़ की लंबी प्रतीक्षा ने जख्म भरने की जगह उन्हें और हरा कर दिया है, इसलिए यह मुद्दा आज भी उनके लिए जिंदा है।
कांग्रेस को क्या नसीहत मिली?
संधवां ने कांग्रेस के नेताओं को साफ शब्दों में कहा कि सत्ता और कुर्सी की राजनीति से ऊपर उठना अब बहुत जरूरी है। उन्होंने कहा कि अगर पार्टी सच में इंसाफ़ चाहती है तो उसे अपना ज़मीर जगाना होगा। ऐसे नेताओं से दूरी बनानी होगी जिन पर 1984 के दाग लगे हैं। सिर्फ बयानबाज़ी से कुछ नहीं बदलेगा, बल्कि खुलकर इंसाफ़ की मांग करनी होगी। उन्होंने यह भी कहा कि चुप रहना भी एक तरह का गुनाह है और इतिहास इसे कभी माफ नहीं करता।
पीड़ित परिवार अब क्या करेंगे?
पीड़ित परिवारों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे हार मानने वाले नहीं हैं और अब वे हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाएंगे। उनका कहना है कि उनकी लड़ाई अभी खत्म नहीं हुई और वे आखिरी सांस तक इंसाफ़ की मांग करते रहेंगे। हालांकि सालों की देरी ने उनका भरोसा कमजोर जरूर किया है। फिर भी उनके मन में कहीं न कहीं उम्मीद की एक किरण बाकी है। वे चाहते हैं कि आने वाली पीढ़ियों को यह न कहना पड़े कि उन्हें कभी इंसाफ़ मिला ही नहीं।
क्या इंसाफ़ की लड़ाई अभी भी जारी रहेगी?
सज्जण कुमार भले ही एक मामले में बरी हो गया हो, लेकिन इससे पूरी लड़ाई खत्म नहीं होती। अभी भी कई मामले अदालतों में लंबित हैं और उन पर फैसले आने बाकी हैं। 1984 से जुड़ा हर केस यह याद दिलाता है कि न्याय की रफ्तार कितनी धीमी हो सकती है। यह साफ है कि इंसाफ़ की यह लड़ाई अभी अधूरी है। जब तक हर पीड़ित को संतोष नहीं मिलता, तब तक ये सवाल समाज और राजनीति दोनों के सामने जिंदा रहेंगे।

























