ईरान के अधिकारी रहीम नदाली के मुताबिक बड़ी संख्या में बच्चे खुद आगे आ रहे थे और युद्ध में योगदान देना चाहते थे। इसी को देखते हुए सरकार ने न्यूनतम उम्र सीमा घटाकर 12 साल कर दी। इसे स्वैच्छिक भागीदारी बताया जा रहा है, लेकिन इस दावे पर भी सवाल उठ रहे हैं।
क्या यह अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन है?
यह फैसला अंतरराष्ट्रीय कानूनों के खिलाफ माना जा रहा है। बच्चों को युद्ध से दूर रखने के लिए कई वैश्विक समझौते बने हुए हैं। ऐसे में मानवाधिकार संगठनों ने इस कदम पर कड़ी आपत्ति जताई है। उनका कहना है कि यह बच्चों के अधिकारों का उल्लंघन है और इसके गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
जंग कितनी गहरी हो चुकी है?
ईरान और अमेरिका के बीच तनाव अब कई स्तरों पर फैल चुका है। हालात ऐसे हैं कि संसाधनों की भारी जरूरत महसूस की जा रही है। इसी दबाव में ऐसे फैसले सामने आ रहे हैं, जो यह दिखाते हैं कि जंग लंबी खिंच सकती है।
अमेरिकी ठिकानों पर क्या असर पड़ा?
रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान के हमलों से मध्य पूर्व में कई अमेरिकी सैन्य ठिकाने प्रभावित हुए हैं। करीब 13 बेस अब पूरी तरह उपयोग के लायक नहीं रहे। सैनिकों को वहां से हटाकर दूसरी जगहों पर शिफ्ट किया गया है। इससे साफ है कि संघर्ष का असर जमीन पर भी गहराता जा रहा है।
क्या ‘रिमोट वॉर’ बन रही है लड़ाई?
विशेषज्ञों का मानना है कि यह संघर्ष अब ‘रिमोट वॉर’ का रूप ले रहा है। यानी सीधे युद्धक्षेत्र की बजाय दूर से हमले किए जा रहे हैं। तकनीक के इस्तेमाल से युद्ध का तरीका बदल रहा है। इससे रणनीति और भी जटिल हो गई है।
आगे क्या खतरा बढ़ सकता है?
सबसे बड़ा खतरा यह है कि अगर हालात ऐसे ही बने रहे तो संघर्ष और फैल सकता है। बच्चों की भागीदारी जैसे फैसले स्थिति की गंभीरता को दर्शाते हैं। अंतरराष्ट्रीय दबाव भी बढ़ेगा और आने वाले समय में इस मुद्दे पर बड़ा विवाद खड़ा हो सकता है। पूरी दुनिया की नजर अब इस घटनाक्रम पर टिकी हुई है।

























