मध्य पूर्व में बढ़ते तनाव के बीच संयुक्त अरब अमीरात ने एक ऐसा कदम उठाया है जिसने पूरी दुनिया को चौंका दिया है। तेल उत्पादक देशों के सबसे प्रभावशाली संगठन OPEC से अलग होने का निर्णय सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी माना जा रहा है। यह फैसला ऐसे समय आया है जब क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ रही है और वैश्विक बाजार पहले से दबाव में है।
ईरान तनाव और समुद्री संकट
खाड़ी क्षेत्र में ईरान के साथ बढ़ते तनाव ने स्थिति को और जटिल बना दिया है। खासतौर पर हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य में जहाजों पर हमले और धमकियों के कारण तेल आपूर्ति प्रभावित हो रही है। यह वही रास्ता है जहां से दुनिया का बड़ा हिस्सा कच्चा तेल गुजरता है। ऐसे में यूएई का यह फैसला बाजार में अनिश्चितता को और बढ़ा सकता है।
सऊदी अरब को लग सकता है झटका
OPEC में सऊदी अरब की पकड़ सबसे मजबूत मानी जाती है। लेकिन संयुक्त अरब अमीरात जैसे बड़े सदस्य का बाहर जाना इस संतुलन को बिगाड़ सकता है। इससे संगठन की एकजुटता पर भी सवाल उठ सकते हैं, क्योंकि अंदरूनी मतभेद पहले से ही मौजूद थे।
यूएई ने क्या कहा?
यूएई के ऊर्जा मंत्री ने साफ कहा कि यह फैसला पूरी तरह स्वतंत्र रूप से लिया गया है। इसमें किसी भी देश, यहां तक कि सऊदी अरब से भी कोई सलाह नहीं ली गई। सरकार का कहना है कि यह कदम देश की उत्पादन नीति, भविष्य की क्षमता और राष्ट्रीय हितों को ध्यान में रखकर उठाया गया है।
क्या अमेरिका के लिए फायदेमंद?
यह फैसला डोनाल्ड ट्रंप के लिए सकारात्मक माना जा रहा है। ट्रंप पहले भी OPEC पर तेल की कीमतें बढ़ाने का आरोप लगा चुके हैं। ऐसे में इस संगठन का कमजोर होना अमेरिका की रणनीति के अनुरूप माना जा सकता है।
क्या है OPEC और OPEC+
OPEC की स्थापना 1960 में तेल उत्पादन और कीमतों को नियंत्रित करने के लिए की गई थी। बाद में OPEC+ बना, जिसमें रूस जैसे देश भी शामिल हुए। इन दोनों समूहों का वैश्विक तेल बाजार पर बड़ा प्रभाव है।
आगे क्या होगा?
यूएई के इस फैसले से अंतरराष्ट्रीय तेल बाजार में अस्थिरता बढ़ सकती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि इससे कीमतों में उतार-चढ़ाव और बढ़ सकता है। साथ ही यह भी सवाल उठ रहा है कि क्या अन्य देश भी इसी रास्ते पर चलेंगे या फिर OPEC अपनी पकड़ बनाए रखेगा।

























